विकास कुमार
मशहूर चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भारत के बारे में विस्तृत ब्यौरा दिया है। नालंदा विश्वविद्यालय में रहकर ह्वेनसांग ने धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथों का अध्ययन किया था। ह्वेनसांग बताते हैं कि विहार विद्या के केंद्र थे। शिक्षा की शुरूआत प्राय: नौ साल की आयु में होती थी और तीस वर्ष तक छात्र अध्ययन करते थे। ह्वेनसांग लिखता है कि शिक्षा पूरी करने पर छात्र अपने शिक्षक की दयालुता का पुरस्कार देते हैं।

ह्वेनसांग नालंदा विश्वविद्यालय के बारे में विस्तार से चर्चा करता है। वह लिखता है कि नालंदा में शिक्षा का स्तर बहुत ऊंचा था और नालंदा में शिष्यों को प्रवेश ज्ञान के परीक्षण के बाद ही मिलता था। ह्वेनसांग बताते हैं कि विद्वान व्यक्ति सभा का आयोजन करते थे। इस सभा में तर्क के आधार पर वाद विवाद का आयोजन किया जाता था। वाद-विवाद में जीतने पर विद्वान व्यक्ति को सज्जित हाथी पर बिठाकर घुमाया जाता था। वहीं यदि व्यक्ति वाद-विवाद में हार जाए तो उसे दुत्कार मिलती थी। इससे पता चलता है कि भारत में प्राचीन काल से ही वाद विवाद की प्रथा चली आ रही है।

ह्वेनसांग लिखता है कि भारतीय लहसून और प्याज नहीं खाते हैं। ह्वेनसांग भारत के लोगों की नैतिक स्तर की दिल खोलकर तारीफ करता है। ह्वेनसांग लिखता है कि भारतीय निष्कपट और ईमानदार होते हैं और वे विश्वासघाती नहीं होते हैं।

