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क्या महाराष्ट्र विधान सभा के स्पीकर ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं किया है ?

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न्यूज़ डेस्क
महाराष्ट्र में लम्बे समय तक चले विधायकों के विवाद पर विधान सभा अध्यक्ष नार्वेकर के फैसले पर  संविधान विशेषज्ञों ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं होने का आरोप लगाया है। यह सुप्रीम कोर्ट  के निर्देश का अवमानना के सामान है। 10 जनवरी के फैसले की आलोचना करते हुए वकील असीम सरोदे ने नार्वेकर पर फैसला लेने में देरी करने और अंततः राजनीतिक उद्देश्यों को ध्‍यान में रखकर फैसला देने का आरोप लगाया।

उन्होंने आरोप लगाया, ”फैसला मैगी नूडल्स की तरह तैयार किया गया था…स्पीकर ने मजिस्ट्रेट कोर्ट की तरह ‘सबूत’ लिया…राजनीतिक मंशा से फैसले में अनावश्यक रूप से लंबे समय तक देरी की गई।”

सरोदे ने कहा कि अध्यक्ष ने उदाहरणों और मानदंडों के विपरीत अपने निर्णय में विधायक दल (मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे गुट के) के बहुमत को स्वीकार किया और उस राजनीतिक दल को नजरअंदाज कर दिया, जो मूल पार्टी है।उन्होंने कहा, विधायक दल का कार्यकाल पांच साल का होता है और बाद में इसमें बदलाव हो सकता है, लेकिन राजनीतिक दल एक बड़ी इकाई है और विधायक दल से ऊपर है, जिस पर अध्यक्ष ने विचार नहीं किया।

उन्होंने यह भी बताया कि हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य सचेतक के रूप में भरत गोगावले (शिंदे गुट के) के चुनाव को “अवैध” घोषित किया था, मगर स्पीकर ने उन्हें कानूनी नियुक्ति घोषित कर दिया और ऐसा करके “अन्याय का नाम बदलकर न्याय कर दिया गया है”।

सरोदे ने स्पीकर के फैसले पर गंभीर चिंता जताई और कहा कि यह सिर्फ एक अंतर-पार्टी विवाद के बारे में नहीं है, बल्कि देश में “लोकतंत्र और संविधान के लिए बुरा संकेत” है।उन्होंने कहा कि 10 जनवरी के फैसले से बहुत पहले, “दूर-दराज के इलाकों तक लोगों के बीच यह स्पष्ट था कि अन्याय होगा” और उनकी आशंकाएं सच हुईं।

शिवसेना-यूबीटी के मुख्य प्रवक्ता और सांसद संजय राउत ने अध्यक्ष के फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि “उन्होंने शिवसेना को चोरों के झुंड को सौंप दिया है”। उन्होंने कहा, “स्पीकर का फैसला महाराष्ट्र की गौरवशाली लोकतांत्रिक परंपराओं पर एक धब्बा है… ऐसा फैसला उनकी (नार्वेकर की) पत्नी को भी स्वीकार्य नहीं होगा।”

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