भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने न्याय व्यवस्था पर बेहद कड़ा बयान दिया है। मुंबई विश्वविद्यालय में आयोजित फाली नरीमन मेमोरियल लेक्चर के दौरान उन्होंने स्पष्ट किया कि न्याय में देरी अब सिर्फ अन्याय नहीं है,बल्कि यह न्याय का पूरी तरह से विनाश है। सीजेआई ने अनुच्छेद 226 की शक्ति पर जोर देते हुए कहा कि अंतरिम राहत ही अक्सर नागरिकों की एकमात्र वास्तविक पहुंच होती है। उनके अनुसार अदालतों को अब दरवाजे पर दस्तक देने का इंतजार नहीं करना चाहिए। न्यायपालिका को कानून के शासन में होने वाली व्यवस्थित विफलताओं के प्रति हमेशा सतर्क रहना होगा। उन्होंने कहा कि एक छोटे किसान या गलत तरीके से प्रवेश से वंचित छात्र के लिए तत्काल राहत ही सब कुछ है।सीजेआई ने न्याय को एक निष्क्रिय अधिकार के बजाय एक सक्रिय राज्य-गारंटी सेवा में बदलने का आह्वान किया है। उनका मानना है कि अदालतों को अब अपनी कार्यप्रणाली में बदलाव करना ही होगा।
संविधान का अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए निर्देश और रिट जारी करने की शक्ति देता है। सीजेआई सूर्यकांत ने इसे न्याय तक पहुंच का सबसे महत्वपूर्ण संरक्षक बताया है।उन्होंने कहा कि जब किसी छोटे किसान की जमीन छीनी जा रही हो या किसी छात्र को गलत तरीके से एडमिशन न मिले तो समय की कीमत बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में अगर अदालत पहली सुनवाई में ही कार्यकारी कार्रवाई पर रोक लगा देती है तो वही असली न्याय है।यदि यह आदेश समय पर न मिले तो नागरिक की पूरी जिंदगी बर्बाद हो सकती है। न्याय में देरी को उन्होंने ‘जस्टिस डिस्ट्रॉयड’ यानी न्याय का विनाश करार दिया है। हाई कोर्ट की यह शक्ति नागरिक को कार्यपालिका की मनमानी से बचाती है।अक्सर गरीब नागरिक के लिए यही अंतरिम राहत उसकी पूरी कानूनी लड़ाई का सार बन जाती है।
देश के उच्च न्यायालयों का भविष्य उनकी सक्रियता पर निर्भर करता है।सीजेआई ने कहा कि अदालतों को केवल मामले आने का इंतजार नहीं करना चाहिए।उन्हें शासन की प्रणालियों में होने वाली कमियों को खुद पहचानना होगा।उन्होंने इसे ‘गैप फिलिंग’ यानी रिक्तियों को भरने का सिद्धांत बताया है।जब कानून किसी मुद्दे पर चुप होता है तो न्यायपालिका को मूकदर्शक नहीं बने रहना चाहिए।अतीत में हमने देखा है कि हाई कोर्ट ने पर्यावरण की रक्षा और कैदियों की गरिमा के लिए स्वतः संज्ञान लिया है। राष्ट्रीय संकट के दौरान प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों को सुरक्षित करने में भी अदालतों की भूमिका अहम रही है। जहां भी न्याय में कोई कमी दिखती है वहां अदालत के आदेशों का पहुंचना अनिवार्य है। एक सक्रिय अदालत ही वास्तव में लोकतंत्र के रक्षक के रूप में अपनी भूमिका निभा सकती है।
सीजेआई सूर्यकांत ने न्याय व्यवस्था को आधुनिक बनाने के लिए ‘डिजिटल गेटवे’ पर बहुत जोर दिया है। उनका कहना है कि वर्चुअल सुनवाई को अब केवल आपातकालीन उपाय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसे पहुंच के एक स्थाई स्तंभ के रूप में अपनाना होगा।आज के युग में तकनीक का विकास अमीर और गरीब के बीच की खाई को गहरा कर रहा है। अदालत को यह सुनिश्चित करना होगा कि तकनीक न्याय में समानता लाने का जरिया बने।उन्होंने गढ़चिरौली की एक आदिवासी महिला और पूर्वोत्तर के एक मजदूर का उदाहरण दिया।इन लोगों को न्याय के लिए लंबी दूरी तय करने की मजबूरी नहीं होनी चाहिए।न्याय न केवल सुलभ होना चाहिए बल्कि वह आम आदमी की जेब के अनुकूल भी होना चाहिए।तकनीक का सही उपयोग ही न्याय के विकेंद्रीकरण का एकमात्र रास्ता है।
मुंबई में आयोजित एक समारोह के दौरान सीजेआई सूर्यकांत का भव्य अभिनंदन किया गया।इस अवसर पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री भी मौजूद थे।उन्होंने सीजेआई से कोल्हापुर सर्किट बेंच को स्थाई बेंच बनाने की अपील की। इस पर सीजेआई ने सकारात्मक रुख दिखाते हुए कहा कि वह इस मुद्दे की गहराई से जांच करेंगे।उन्होंने संबंधित अधिकारियों से इस बारे में बात करने का आश्वासन भी दिया।सुप्रीम कोर्ट की ओर से इस तरह के सुधारों के लिए निरंतर समर्थन मिलता रहेगा। सीजेआई ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका प्रक्रियात्मक नवाचार के माध्यम से अधिकारों और उपचारों के बीच की खाई को भरेगी। कोल्हापुर जैसी स्थाई बेंच बनने से हजारों लोगों को स्थानीय स्तर पर त्वरित न्याय मिल सकेगा।
