इस समय चीफ जस्टिस सूर्यकांत अपने निर्णयों की वजह से देश में चर्चा का केंद्र बिंदु बन गए हैं। एक तरफ जब देश गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच अखाड़ा बन गया था। और इस अखाड़े में होने वाली कुश्ती से देश के लोकतंत्र पर कुचलाये जाने का खतरा मंडराने लगा था, तब चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने एक तरफ जहां सत्ता पक्ष से मनमाने निर्णय लेने को लेकर सवाल कर दिया तो वहीं दूसरी तरफ विपक्ष पर भी जबरदस्ती जांच एजेंसी के कार्यों में बाधा पहुंचाने को लेकर सवाल कर लोकतंत्र को कुचलने से बचा लिया, तो वहीं दूसरी तरफ अभी यूजीसी के द्वारा लाए गए एक नियम जिसकी वजह से उत्पन्न होने वाला जातिवाद का लहर हमारे संविधान के समता मूलक समाज बनने के प्रयास को डुबा सकता था, उसपर फिलहाल रोक लगाकर संविधान की समता मूलक भावना को डूबने से बचा लिया।
कुछ दिन पूर्व जस्टिस सूर्यकांत ने मुंबई में एक कार्यक्रम के दौरान यह बात कही थी कि अब न्यायपालिका को मूकदर्शक बन कर संविधान की मूल आत्मा होने वाले किसी भी प्रहार को देखकर चुप नहीं रहना होगा। बल्कि अब इसे पूरी तरह से सक्रिय होकर संविधान की मूल आत्मा पर होने वाले हर प्रहार का प्रतिकार करना होगा।
संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर ने देश में समता मूलक समाज की स्थापना करने के लिए संविधान में अनुच्छेद 14 से लेकर अनुच्छेद 18 तक में कई प्रावधान किये हैं। इस दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने के उद्देश्य से उन्होंने कुछ खास वर्ग के लोगों को तत्कालीन स्थिति को देखते हुए विशेष आरक्षण देकर 10 वर्ष की समयावधि के अंदर देश में समता मुलक समाज के निर्माण की बात की थी। तब उन्होंने संविधान के नियमों के दुरुपयोग की बात करते हुए संविधान सभा के प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में अपनी अध्यक्षता में बनाए गए इस संविधान को बेहतरीन संविधान बताते हुए कहा था कि संविधान की तमाम अच्छाइयां इस बात पर निर्भर करेगी कि आगे इसे चलाने वाले सत्तासीन वर्ग अच्छी प्रवृत्ति वाले हैं या बुरी प्रवृत्ति वाले।
संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की कही इन बातों को अगर वर्तमान संदर्भ में देखें तो यह स्पष्ट नजर आता है कि देश में अभी तक समता मूलक समाज के निर्माण नहीं हो पाने और देश के धर्म संप्रदाय और जाति पाति में अब तक बटे रहने की बड़ी वजह सत्ताधारी वर्ग ही रहा है, जो देश में समता मूलक समाज के निर्माण की जगह आरक्षण और अन्य कई तरह के प्रयासों से वोट लेने के चक्कर में देश को असमानता की आग में झोंक दे रहे हैं। यूजीसी के नए नियमन पर स्थगनादेश देश देते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सरकार और यूजीसी से कई महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे हैं ,जो देश को जाति पाति जैसे असमानता में धकेलना वाला प्रतीत होता है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने 13 जनवरी 2026 को जारी किए गए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना (संशोधन) विनियम, 2026’ पर रोक लगा दी है।
CJI सूर्यकांत द्वारा यूजीसी नियमों पर दिए गए निर्देश और टिप्पणियां इस प्रकार हैं:
नए नियमों पर रोक (Stay on 2026 Rules): कोर्ट ने 2026 के नए नियमों को तुरंत प्रभाव से रोक दिया है और फिलहाल 2012 के पुराने नियमों को जारी रखने का निर्देश दिया है।
नियमों को ‘अस्पष्ट’ और ‘व्यापक’ बताया: जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने कहा कि नए नियम बहुत “व्यापक” (Too sweeping) और अस्पष्ट हैं, जिनका दुरुपयोग हो सकता है।
‘प्रतिगामी समाज’ पर सवाल: चीफ जस्टिस ने इस बात पर चिंता जताई कि क्या हम 75 वर्षों के बाद एक जातिविहीन (casteless) समाज की ओर बढ़ने के बजाय एक “प्रतिगामी (regressive) समाज” बन रहे हैं।
‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ का मुद्दा: अदालत ने उन याचिकाओं पर विचार किया जिनमें आरोप लगाया गया था कि ये नियम सामान्य वर्ग (General Category) के छात्रों के साथ भेदभाव करते हैं और यह “रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन” (उल्टा भेदभाव) को बढ़ावा दे सकते हैं।
विशेषज्ञ समिति द्वारा पुनरीक्षण: कोर्ट ने सुझाव दिया कि इन नियमों का एक विशेषज्ञ समिति द्वारा पुनरीक्षण (revisiting) किया जाना चाहिए।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत के इस निर्देश के बाद अब या उम्मीद की जाती है की यूजीसी के नए नियमन के विरोध में हो रहे तमाम प्रदर्शन बंद हो जाएंगे लेकिन देश में ऐसे प्रदर्शन पूरी तरह से समाप्त हो जाए या इस बात पर निर्भर करेगा की चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूरजकांत के द्वारा उठाए गए मूल प्रश्न कि भारत के गणतंत्र हुए 75 वर्ष से भी ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद भारत जाति पाति धर्म संप्रदाय से मुक्त समता मूलक समाज क्यों नहीं बना और उसे बनाने की दिशा में सरकार क्या निर्णय ले रही है और ऐसे विभेदकारी नियमों की वजह से होने वाले प्रतिगामी असर को सरकार कैसे समाप्त करेगी।
