अखिलेश अखिल
आजादी के 76 वर्ष पूरे और 77 वे वर्ष का आगाज। देश के भीतर धूम मची है। मचनी भी चाहिए। हम आजाद जो हैं। लेकिन आम आदमी की नजरिये से देखिये तो आखिर इस आजादी के मायने क्या है ? एक तरफ चारो तरफ तमाम सरकारी योजनाओं का मायाजाल तो दूसरी तरफ गरीबी ,दयनीयता और मजबूरियों का जंजाल ! इतने वर्षों की आजादी के बाद भी हम आज भी 80 करोड़ लोग पांच किलो फ्री अनाज पाकर इत्र रहे हैं। फक्र कर रहे हैं कि हम एक महँ देश के नागरिक हैं और हमारी इकॉनमी दुनिया की सबसे तेज इकॉनमी है और हम जल्द ही चाँद पर पहुँच रहे हैं। कितना विरोधाभाष है इस खेल में !
अमीरी में गरीबी की कहानी आजादी के वक्त भी कही जाती थी और आज भी यही कहानी चल रही है। लेकिन आश्चर्य देखिये आज भी इसी देश में जनता के सामने गारंटी देने को होड़ लगी हुई है। जनता से वोट पाने के लिए तरह -तरह की गारंटी ! यह आजाद भारत का ऐसा सच है जिसकी कल्पना देश के उन तमाम नेताओं ने नहीं की थी जिन्होंने अपने लहू को बहाकर इस देश की आजादी हमें दी थी। आज वे नेता जीवित होते तो मौजूदा व्यवस्था पर ही नहीं ,हमारे ऊपर भी वे हँसते और रुदाली भी करते। लेकिन आज सब यही तो हो रहा है। और इस खेल में सभी पार्टियां और सभी नेता एक साथ खड़े हैं। कौन किसी को दोषी ठहरा सकता है ?
देश का किसान आत्महत्या कर रहा है। बेरोजगार युवक के पास रोजगार नहीं है। देश की महिलायें सुरक्षित नहीं है। वह बलात्कार और हिंसा की शिकार होती है और जुबान खोलने पर और भी नंगी हो जाती है। आंकड़ों को उठाकर देखिये तो हर दल में ऐसे दर्जनों नेता रूपी लोग आप को मिल जायेंगे जो महिला को वास्तु से ज्यादा कुछ नहीं मानते और मौका मिलते ही वह सब कुकर्म कर जाते हैं जिसकी कल्पना भी कोई नहीं कर सकता। फिर भी देश की महिलाओं से कहा जाता है कि वो आजाद है और सुरक्षित भी।
और राजनीति की तो बात ही नहीं की जाए। जब संसद में ही सरकार से लेकर विपक्ष के लोग सरेआम झूठ बोलते हों और दोनों तरफ के चाटुकार लोग ताली बजाते हों और गलत को भी सही कहते हों उसे आप क्या कहेंगे ? क्या संसद को झूठ बोलने का अड्डा बनाया गया था ? क्या संसद राजनीतिक पार्टियों का दफ्तर है झन से बेख़ौफ़ झठ पडोसी जाती है ?
इसी संसद में गुंडों ,बदमाशों ,बलात्कारियों ,डकैतों ,खुनी और दगाबाजी करने के आरोपियों की भीड़ लगी हुई है। संसद के भीतर बैठने वाले सफ़ेद कपड़ों में जो नेता आते हैं उनके दमन पर कीचड़ है। उनके चेहरों पर कालिख के दाग हैं। लेकिन सबसे बड़ा सच यही है कि ऐसे नेताओं को जनता ही चुन कर भेज रही है। कोई जाती के नाम पर वोट दाल रहा है तो कोई धरम के नाम पर नेताओं को चुन रहा है। कोई पैसे खाकर वोट डालता है तो कोई डर से वोट डालता है। और भी कहा जाता है कि यह दुनिआ का सबसे बड़ा लोकतंत्र है।
राज्य सभा की बात ही मत कीजिये। वहां तो अमीरों का जमघट है। लगता है यह सभा धनकुबेरों का क्लब है। त्रासदी ये है कि यही नेता रूपी जीव संसद में बैठकर कानून बनाते हैं और गरीबी कैसे खत्म होगी इस पर योजनाओं की स्वीकृति देते हैं। जिनके हाथ खुद ही ठगी ,बेईमानी और लूट में दुबे हुए हैं वे देश का उद्धार करना चाहते हैं। फिर भी हमें अपने लोकतंत्र पर गुमान है !
संसद की कार्रवाई को देखिये तो लगता है यह कोई मछली बाजार है। कहने को अधिकतर नेता खुद को पढ़ा लिखा मानता है। लेकिन उसकी शिक्षा कितनी है और कैसी है ,संसद के भीतर देखी जा सकती है। किसी पर नकली सर्टिफिकेट रखने का आरोप है तो किसी पर नकली डिग्री के जरिये यहां तक पहुँचने की कहानी सुनाई देती है। और जनता सब पर ताली बजती है और खुद ताली सुनने का शुक्र हो जाती है। इन नेताओं के भाषण को सुनिए तो लगता है मानो ये इस देश के सबसे बड़े ज्ञानी है लेकिन इनका ज्ञान कितना सार्थक है इस पर दुनिया के लोग कहकहे लगते हैं और हँसते भीहैं। इनकी विशेषता यही है कि कैसे लोकतंत्र को कमजोर किया जाये ,जनता को मुर्ख रखा जाये और कैसे चुनाव में अजेंडा चलकर मैदान को फतह किया जाए। आजाद भारत में राजनीति एक व्यवसाय है। यह ऐसा व्यवसाय है जिसमे हानि होती ही नहीं। लाभ ही लाभ।
हर तरफ लूट ,ठगी और घोटाले चल रहे हैं और उसे ढकने के लिए जनता के बीच कुछ ठगी वली योजनाए चलाई जाती है ताकि जनता उसी में मग्न रहे और वे जो कर रहे हैं उसकी तरफ देखे तक नहीं। और जो देखे और बोले उस पर उनके बनाये कानून के जरिये ध्वस्त कर दिया जाए। यह सब आज से नहीं सालों से चल रहे हैं। लाल किला के प्राचीर से की प्रधन्मन्त्रीयों ने भाषण दिए हैं। सबके भाषण रिकॉर्ड में है। जरा उन भाषणों को पढ़िए तो पता चल जायेगा कि कई घंटों के ये भाषण हमें दिए क्या हैं ? हर भाषण में हमे सब्जबाग दिखाए जाते हैं। कुछ कर देने की बात कही जाती है। हर बार पाकिस्तान की बात कही जाती है। पकिस्तान भूखों मर रहा है तो भारत को इससे क्या लेना देना ? लेकिन इसकी चर्चा इसलिए की जाती है ताकि भारत के गरीबो और भक्तों को यह पता चले कि देखों पकिस्तान का क्या हाल ? हमारी ही सरकार है जो अभी तक तुम जीवित हो। और जीवित रहना चाहते हो तो हमारा माला जपते रहो।
और अंत में सबसे बड़ी बात कि हम इतने ताकतवर ही होते जा रहे हैं तो देश की बुनियादी समस्याएं खत्म क्यों नहीं हो रही। ये रवडी योजनाए क्यों चल रही है ? ये नकद पैसे देने की बात क्यों की जाती है ? ये 80 करोड़ लोगों को पांच किलो अनाज क्यों बांटे जा रहे हैं ? ये सब रेवड़ी ही तो हैं। कोई फ्री बिजली दे रहा है तो कोई फर्रे बस सफर कर रहा है। लेकिन इस देश की किसी भी सरकार ने आज तक सबको रोजगार की बात नहीं कर रही है। सबको बेहतर शिक्षा की बात नहीं कर रही है। सबको बेहतर स्वास्थ्य की बात नहीं कर रही है। सबको न्याय और सबकी सुरक्षा की बात क्यों नहीं की जा रही है ? आखिर करेगा कौन ?
इससे ज्यादा जरुरी है धार्मिक उन्माद फैलाने की। धर्म का बाजार तैयार करने की। धर्म के आसरे राजनीति को आगे बढ़ाने की। हलाकि यह देश किसी की बपौती तो नहीं है लेकिन इस देश का बड़ा सच यही है कि तिरंग तो अमर रहेगा लेकिन आज की राजनीति नहीं रहेगी। और हमारी आने वाली नश्ले हम पर हँसेगी और हम जवाब देने के लिए भी नहीं रहेंगे।
