और झारखंड में चंपई  सोरेन विभीषण घोषित कर दिए गए —–

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अखिलेश अखिल 
ठगिनी राजनीति में ईमानदार राजनीति कैसी ? जब नेता ही झूठ और ठगी के दम पर राजनीति को आगे बढ़ाते हैं तब राजनीति कैसे ईमानदार हो सकती है। इस खेल में कोई चंपई सोरेन ही शामिल नहीं है। झारखंड के राजनीतिक इतिहास को देखे तो पता चलेगा कि इस राज्य के निर्माण के साथ ही अधिकतर नेताओं ने यहाँ की जनता को छलने का काम किया और पुरे मन से लूट को भी अंजाम दिया। किसी भी नेता के पास यह सहस नहीं है कि वह दावा कर सके कि उसकी राजनीति ईमानदार है और वह जनता की भलाई के लिए समर्पित है। पहले यही काम कई और नेता कर चुके हैं ,आज चंपई सोरेन की बारी है और कल किसी और की बारी आएगी।      

बीजेपी जो भी कर रही है यह उसका इतिहास हो सकता है लेकिन जो नेता यह सब कर रहे हैं उसका इतिहास तो अब बन रहा है। चंपई सोरेन आगे क्या करते हैं यह देखने की बात होगी लेकिन अब यह तय हो चुका है कि अब वे झामुमो के साथ नहीं रहने जा रहे हैं। झामुमो भी उन्हें शायद ही अपने साथ रखें और लज्जा बची होगी तो अब शायद ही चंपई झामुमो के साथ जायेंगे।

राज्य के बहार उनकी काफी किरकिरी हो रही है और राज्य की राजनीति में अब वे बदनाम हो चुके हैं। खुद की नजरों में गिर गए हैं। ऐसे में अब दोष बीजेपी का नहीं ,सारा दोष चम्पई का ही है।  चंपई की अगली राजनीति चाहे जो भी हो लेकिन बीजेपी के साथ भी वे रह नहीं सकते। झामुमो छोड़कर कई नेता बीजेपी के साथ गए थे। कुछ तो लौट आये और जो नहीं लौटे उनकी कोई औकात बची नहीं है।

ऐसे में झारखंड सरकार के मंत्री और कांग्रेस नेता बन्ना गुप्ता ने जो कहा है उस पर नजर डालने की जरूरत है। जमशेदपुर-झारखंड के स्वास्थ्य एवं खाद्य आपूर्ति मंत्री बन्ना गुप्ता ने कहा है कि झारखंड का इतिहास जब भी लिखा जायेगा, चंपाई सोरेन का नाम विभीषण के रूप में दर्ज होगा। जिस पार्टी और माटी ने उनको सब कुछ दिया, उसको ठुकराकर अपने आत्मसम्मान को गिरवी रखकर वे सरकार को तोड़ने का काम कर रहे थे, लेकिन समय रहते जब चीजें सामने आ गईं तो सोशल मीडिया के जरिए उन्होंने हकीकत बयां की है। वे अब पछतावा कर रहे हैं और मुंह छिपा रहे हैं। 
मंत्री बन्ना गुप्ता ने कहा कि दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने एक साधारण व्यक्ति को जमशेदपुर से निकाल कर पहचान दी।  उनको मान सम्मान दिया, हर संभव मदद किया, पार्टी में अपने बाद का ओहदा दिया। जब-जब जेएमएम की सरकार बनी उसमें मंत्री बनाया। सांसद का टिकट दिया. हर निर्णय का सम्मान किया, लेकिन उसके बदले चंपाई दा ने राज्य को मौकापरस्ती के दलदल में झोंकना चाहा। 

बन्ना गुप्ता ने कहा है कि हमारे नेता हेमंत सोरेन जब जेल जाने लगे तो उन्होंने सभी सत्ता पक्ष के विधायकों से चंपाई सोरेन को मुख्यमंत्री बनाने की बात कही तो हम सभी ने हेमंत सोरेन की बात मानी. जब खुद को मुख्यमंत्री बनने की बात थी तो वो निर्णय चंपाई दा को बुरा नहीं लगा।  प्रोटोकॉल के खिलाफ नहीं लगा, तानाशाही नहीं लगा?

बन्ना गुप्ता कहते हैं कि जब हमारे नेता जेल से छुटकर आ रहे थे तो चंपाई सोरेन कैबिनेट की बैठक में व्यस्त थे, जबकि इतिहास गवाह है कि जब वनवास के बाद प्रभु श्रीराम वापस आये तो भरत ने उनका स्वागत कर उनसे राज सिंहासन पर बैठने का आग्रह किया था. मगर चंपाई दा तो अकेले निर्णय लेने में व्यस्त थे, उस समय तो कांग्रेस समेत झामुमो के मंत्रिमंडल के साथियों ने भी कैबिनेट में बात उठाई थी। 

हर विभाग में उनका हस्तक्षेप था. हर मंत्रालय में वे खुद निर्णय लेने लगे थे।  तब उनको नेतृत्व में तानाशाही महसूस नहीं हुआ था क्या? दूसरे को नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले और झूठा सहानुभूति इकट्ठा करने के चक्कर में चंपाई दा अपने कुकर्मों को भूल गए हैं शायद। 

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