क्या हम WHO पर भरोसा कर सकते हैं?

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वंदना शिवा(समाजसेवी)

एक पुराना WHO था जिसके बारे में आपने किताबों में पढ़ा था। अब एक नया WHO है जो यूनाइटेड नेशन चार्टर के मुताबिक नहीं है। नए WHO पर भरोसा नहीं किया जा सकता है, जबकि पुराने WHO वैश्विक सरकार के लिए नहीं था। हमें इनमें अंतर करना पड़ेगा, पहले सभी देशों का एक अंतरराष्ट्रीय चार्टर था जो सभी देशों को समान और संप्रभु मानता था। इसका डिजाइन युद्ध का अंत करने के लिए किया गया था क्योंकि यूरोप में एक खौफनाक युद्ध लड़ा गया था। यूरोप हमेशा के लिए युद्ध से छुटकारा पाना चाहता था ताकि सभी लोगों को न्याय और सम्मान दिलाया जा सके, मानव अधिकारों को प्रोत्साहित किया जा सके और व्यापक स्वतंत्रता प्रदान की जा सके।

यूनाइटेड नेशन के इस स्वरूप को देखकर ही हम बड़े हुए। यह एक वैश्विक सरकार नहीं था। इसके चार्टर की शुरुआती पंक्तियां थी- हम यूनाइटेड नेशन के लोग। हम संप्रभु लोग थे। देश हमारा प्रतिनिधित्व करते थे और कोई यूएन सिस्टम लोगों और सदस्य राष्ट्रों की संप्रभुता नहीं छीन सकता था। हालांकि जलवायु सम्मेलन में अरबपतियों द्वारा सदस्य राष्ट्रों की संप्रभुता को कमतर किया जा रहा है। जलवायु संधियां प्रदूषण को रोकने के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी है लेकिन 1992 में रियो में प्रदूषकों को इसके लिए राशि का भुगतान करने का प्रावधान किया गया था।

2009 में कानूनी बाध्यताओं को कमतर किया गया और बाद में पेरिस में जो हुआ उससे क्लाइमेट नेगोशिएशन का अंत हो गया और यहां से बिल गेट्स ने अपना काम शुरू किया। यूएन में स्टेट एक्टर्स,कॉरपोरेशन, अरबपति सदस्य नहीं हो सकते बल्कि केवल राष्ट्र ही इसके सदस्य हो सकते हैं। अब बिल गेट्स यूनाइटेड नेशन सिस्टम को चला रहे हैं – पहले जलवायु के मामले में भी ऐसा हुआ…फिर खाद्य सम्मेलन में भी यही हुआ…और उसने अब WHO पर कब्जा जमा लिया है। लंबे अरसे से वह सबसे बड़ा दानदाता रहा है।

अब देश क्यों नहीं फंड दे रहे हैं? …देश अपनी स्वतंत्रता क्यों खो रहे हैं?. UN सिस्टम में एक देश को एक वोट का सिस्टम लागू है। छोटे देशों को भी अमेरिका के बराबर वोट देने का अधिकार है। गरीब अफ्रीकी देश अमेरिका के किसी प्रस्ताव को रोकने की ताकत रखते हैं। ब्रेटन वुड्स संस्थाओं में ज्यादा डॉलर देनेवाले देश को ज्यादा अधिकार दिए गए हैं। अमेरिका WTO के अध्यक्ष को नियुक्त करता है, हालांकि एक भारतीय को इसका अध्यक्ष बनाया गया है लेकिन उनकी नियुक्ति अमेरिका के राष्ट्रपति ने की है।

आईएमएफ के हर अध्यक्ष की नियुक्ति यूरोप द्वारा की जाती है। बॉयोडाइवरसिटी एक्ट में भी संशोधन का अधिकार लोकल कम्युनिटी को दिया गया था जबकि नए संशोधन में कम्युनिटी के अधिकार को खत्म कर दिया गया है। बायोपायरेसी को हमने देश और अंतरराष्ट्रीय कानून में वैध घोषित कर दिया है। हम एक बड़े बदलाव वाले दौर में रह रहे हैं और राष्ट्रीय कानून में बदलाव आ रहा है…अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में बदलाव आ रहा है…और नया WHO इस नए व्यवस्था का हिस्सा है। FAO का संबंध खाद्य और कृषि से है लेकिन अब इसे मिस्टर गेट चला रहे हैं। अब इसमें प्वाइजन कार्टेल की भी भूमिका है। हम लोग से ये हम कॉरपोरेशन तक पहुंच गया है। यानी जलवायु,खाद्य,हेल्थ जैसे मुद्दों पर राष्ट्रों की संप्रभुता खतरे में आ गई है। WHO अपने वास्तविक चार्टर से भटक गया है।

नए हेल्थ एग्रीमेंट राष्ट्रों की शक्ति को कमजोर करता है। असल में WHO को गाइडेंस मुहैया कराना था लेकिन अब यह मेंडेटरी सिस्टम तैयार कर रहा है। हमारे जीवनकाल में ही ऐसा हो रहा है। झूठे नेरैटिव गढ़े जा रहे हैं। नए ट्रीटी से दूर जाने की जरुरत है। वे समझते हैं कि लोग समझते नहीं हैं या लोग नोटिस नहीं लेते हैं। और इसलिए मैं अवेकन इंडिया मूवमेंट को शुभकामना देना चाहती हूं कि वे लोगों को जागरूक कर रहे हैं। शक्ति के खिलाफ लोगों का संघर्ष भूलने की आदतों के खिलाफ संघर्ष है।हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि महामारी ने क्या किया, हमें नहीं भूलना चाहिए कि सार्स और एच1एन1 में उन्होंने महामारी जैसा माहौल बनाने की कोशिश की। इस दौरान बड़े पैमाने पर दवाइयों की खरीद की गई लेकिन वे सब बेकार चली गई।

एच1एन1 की शुरुआत मैक्सिको और अमेरिका से हुई थी लेकिन लोगों ने गरीब आदिवासी महिलाओं के एक बत्तख को मार दिया जो उसके जीने का एकमात्र सहारा था। इसलिए हर महामारी एक झूठ है। स्वीडन ने कभी लॉकडाउन घोषित नहीं किया।अमेरिका ने कड़ाई से लॉकडाउन लागू किया लेकिन वहां पर मृत्यु दर काफी ज्यादा था। बुजुर्ग लोग ओल्ड केयर होम्स में मर गए। जब ये सब शुरू हुआ तो मैं भारत लौट गई और न्यूयार्क की कवर स्टोरी शर्मनाक थी। ये कहता है कि ये वक्त है जब निर्णय लेना पड़ेगा कि कौन जिएगा और कौन मरेगा?। उन लोगों ने ये तय कर लिया था किसे जीना है और किसे मरना है। उन्होंने बुजुर्ग,गरीब और वंचित लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया।

मैंने कनाडा में पीएचडी की है और कनाडा में सभी के पास घर है। अब नए लिबरल अर्थव्यवस्था में कनाडा में भी लोगों के पास घर नहीं है। लोगों को स्कूल से निकाल दिया गया है और लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है। कुछ महीने पहले कनाडा सरकार ने एक कानून पारित किया है कि स्ट्रीट पर रहना अवैध है लेकिन आत्महत्या करना वैध है। सड़क पर आत्महत्या करने को वैध बनाने के लिए कानून बनाया गया है। जब आप ऐसा समाज बनाते हैं जहां लोगों से छुटकारा पाना ही आपकी विचारधारा हो तब दुनिया के अरबपति लोगों के अधिकार को छीन लेते हैं। यूएन चार्टर मानवाधिकारों की रक्षा के लिए बना है लेकिन इस नए हेल्थ एग्रीमेंट में हर पंक्ति में इसका उल्लंघन किया गया है।न्यू हेल्थ ट्रीटी राष्ट्रों और लोगों के अधिकारों का उल्लंघन करती है।

अभी मैं इंग्लैंड में थी जहां वर्ल्ड हेल्थ काउंसिल ने अपने पब्लिकेशन में ग्लोबल पब्लिक हेल्थ में मोनोपोली को खारिज करनी की बात लिखी है। मैं आपको सुझाव देती हूं कि आप उनके वेबसाइट पर जाएं जहां आपको संशोधन की हर पंक्ति के बारे में पता चल जाएगा। आप इसे फैला दें। मेरे विचार में संप्रभुता को कमतर किया जा रहा है इसलिए इस अवैध संधि के खिलाफ आवाज उठाया जाना चाहिए। WHO बिल गेट्स के कब्जे में है,अधिकतर मीडिया संस्थान उनके नियंत्रण में है, सीड उनके कब्जे में है, शिक्षा उनके कब्जे में है। बिल गेट्स न्यूयॉर्क के गवर्नर के पास ये कहने के लिए गए कि आप क्यों रियल एस्टेट को स्कूल के लिए दे रहे हैं जबकि इसे होम स्टे के लिए देना चाहिए। ग्रेट रिसेट हमेशा के लिए होगा। महामारी एक तरह से इसका रिहर्सल था। उन्होंने ट्रीटी को इतनी जल्दी लाया है ताकि लोग इकट्ठा ना हो सकें और याद ना कर सकें। हमें नए स्लोगन बनाना चाहिए। WHO पर भरोसा नहीं करना चाहिए। गेट्स पर भरोसा नहीं करना चाहिए जिसने लोगों को मारा है। ये संप्रभुता के बारे में है, भारत के लिए भी ये खतरा है।

भारत में हेल्थ स्टेट सब्जेक्ट है। केरल ने इस पर रिएक्ट किया है क्योंकि उसके पास संप्रभु हेल्थ पॉलिसी है। इसलिए महत्वपूर्ण है कि जिन राज्यों ने पब्लिक हेल्थ के लिए अलग से काम किया है उन्हें WHO और केंद्र सरकार को पत्र भेजना चाहिए और इस ट्रीटी को ना कहना चाहिए।

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