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इसराइल के साथ मिलकर हमला कर क्या ड्रम खुद के उन्हें जाल में फंसे लगे हैं

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जब से दूसरी बार अमेरिका के राष्ट्रपति बने हैं,तब से पूरी दुनिया में उथल-पुथल मचाने में जुट गए है। पहले तो शांति दूत बनकर अनधिकृत रूप से नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने के प्रयास में जुट गए। और फिर रूस यूक्रेन से लेकर भारत और पाकिस्तान समेत 8 युद्धों को किसी को ट्रेड डील से तो किसी को अन्य डील के सहारे रुकवाने की बात कह कर उन देश की सरकारों को बदनाम करने में जुट गए। फिर जब इसमें उन्हें हर जगह निराशा हाथ लगी तो फिर टैरिफ की वार से दुनिया भर के देश की अर्थव्यवस्था को धराशाई करने में जुट गए। जब यहां भी उन्हें सफलता नहीं मिली और अपने ही देश की सर्वोच्च न्यायालय से उन्हें ऐसा करने का अधिकार होने का फटकार मिला तो इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर आक्रमण कर अब पूरी दुनिया को खाद से लेकर खाद्य समस्या से दो चार होने के लिए मजबूर कर दिया है।

भारत में भी इस समय सबसे बड़ा संकट एलपीजी गैस के रूप में सामने आ गया है,जो अमेरिका और इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर आक्रमण के वजह से स्ट्रेट ऑफ हार्मुज से होकर तेल टैंकरों के नहीं आने की वजह से उत्पन्न हुई है।लोग घरों में अनाज रहते हुए भी एलपीजी गैस के अभाव में भूखे रहने के लिए विवश हो रहे हैं। रेस्टोरेंट बंद हो रहे हैं और यहां तक कि मंदिरों के प्रसाद में से भी खीर जैसे उन प्रसादों को हटाया जा रहा है, जिसे बनाने के लिए एलपीजी गैस की जरूरत पड़ती है।
इसराइल के साथ मिलकर ईरान पर हमला कर ट्रंप ने भले ही मह सोचा सोचा होगा कि तीन-चार दिन के अंदर ताबड़तोड़ हमला कर ईरान को घुटने पर ला देगा और फिर वहां सत्ता परिवर्तन कर वहां के तेल उत्पादन पर अपना कब्जा जमा कर अच्छी कमाई करेगा और टैरिफ की वजह से कीमत बढ़ने के कारण अमेरिकी लोगों को जो परेशानी हुई है, उसे इस कमाई से राहत देकर अमेरिकी लोगों के बीच अपनी पैठ बढ़ाने का प्रयास करेंगे। लेकिन लगता है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह दांव उल्टा पड़ गया। ईरान के सर्वोच्च नेता , अयातुल्ला अली खामेनेई और उनके मरने के बाद उसके बेटा मोजतबा खामेनेई के सर्वोच्च नेता चुने जाने के घायल हो जाने के बावजूद ईरान ने घुटने नहीं टेके। जो जेन जी अयातुल्ला अली खामेनेई) के विरुद्ध पूर्व में विद्रोह कर रहे थे वे सब भी अब ईरान के पक्ष में पूरी शक्ति लगाकर अमेरिका और इजरायल के विरुद्ध भीड़ गये हैं। अमेरिका पर तो उतना नहीं ,लेकिन इसराइल के आयरन डोम को तोड़कर ईरान वहां ताबड़तोड़ हमला कर रहा है और मिडिल ईस्ट के उन देशों पर तो यह अपने मिसाइल और बमों से कहर बरपा रहा है, जहां अमेरिका ने अपने सैन्य ठिकाने बना लिए हैं।

अमेरिका और इजरायल के साथ ईरान का यह युद्ध इतना भयावह रूप ले चुका है कि पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था चरमराने लगी है। अब ईरान ही नहीं मध्य पूर्व के अमेरिकी समर्थक देश के साथ-साथ यूरोपियन यूनियन और यहां तक की अमेरिका में भी ट्रंप का विरोध होना शुरू हो गया है।

दुनिया के अन्य देशों को तो डोनाल्ड ट्रंप अपनी जिद के आगे शायद ही सुने ,लेकिन अब अमेरिका में भी लोग डोनाल्ड ट्रंप के इसराइल के साथ मिलकर ईरान पर हमला करने से उत्पन्न स्थिति को लेकर खपा होने लगे हैं।

ईरान-अमेरिका-इजराइल के बीच चल रहे वर्तमान तनाव (2026 की स्थिति) में अमेरिका के प्रति वैश्विक और अमेरिकी नागरिकों के बीच नकारात्मक भावनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा रही है।
ताजा सर्वेक्षणों और रिपोर्टों (मार्च 2026) के आधार पर, यहाँ स्थिति का विवरण दिया गया है:
1. अमेरिकी जनता में असंतोष
सैन्य हस्तक्षेप का विरोध: मार्च 2026 के polls के अनुसार, अधिकांश अमेरिकी (लगभग 56% से 60%) ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई और युद्ध को सीधे तौर पर नापसंद कर रहे हैं। लोग इस बात से नाराज हैं कि युद्ध की वजह से अमेरिकी नागरिकों की जान और पैसा खतरे में पड़ रहा है।
असंतोष का कारण: अमेरिकी जनता का मानना है कि यह युद्ध उनकी सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि विदेशी नेताओं (इजराइल) के एजेंडे को पूरा करने के लिए लड़ा जा रहा है।
पार्टी विभाजन: डेमोक्रेट्स और इंडिपेंडेंट वोटर युद्ध के खिलाफ हैं, जबकि रिपब्लिकन का एक वर्ग सैन्य कार्रवाई का समर्थन करता है, फिर भी कुल मिलाकर लोग युद्ध के विस्तार के खिलाफ हैं।

2. मिडिल ईस्ट (खाड़ी देशों) में नाराजगी
सुरक्षा पर सवाल: सऊदी अरब और कुवैत जैसे खाड़ी देशों में अमेरिका के प्रति असंतोष बढ़ा है। क्षेत्रीय अधिकारियों का मानना है कि अमेरिका अपने सैन्य ठिकानों की रक्षा कर रहा है लेकिन सहयोगी देशों को ईरान के हमलों के सामने छोड़ रहा है।
‘एम्पायर ऑफ वॉर’: क्षेत्र में अमेरिका को एक ‘युद्ध साम्राज्य’ (Empire of War) के रूप में देखा जा रहा है, जो अपने स्वार्थ के लिए मध्य पूर्व में अस्थिरता को बढ़ावा दे रहा है।
युवाओं में असंतोष: युवा पीढ़ी, जो अधिक जागरूक है, अमेरिकी अधिपत्य (Hegemony) के प्रति बहुत संशयात्मक है और इजराइल की कार्रवाइयों के लिए अमेरिका की मिलीभगत को जिम्मेदार मानती है।

3. अंतरराष्ट्रीय और मानवीय दृष्टिकोण
गाजा और अन्य क्षेत्रों में हताहत: अमेरिकी-इजराइली संयुक्त हमलों के कारण नागरिकों की मौत, जैसे कि 165 से अधिक लड़कियों की मौत (रिपोर्टों के अनुसार), ने पश्चिमी देशों में भी अमेरिका के प्रति गुस्से को बढ़ाया है।
अंतरराष्ट्रीय कानून पर दोहरा रवैया: यह धारणा मजबूत हुई है कि अमेरिका कानून का इस्तेमाल केवल दूसरों पर करता है, लेकिन स्वयं और अपने सहयोगियों (इजराइल) के लिए उसे अनदेखा करता है।

4. 2026 के युद्ध की स्थिति
सीधे हमले: अमेरिकी ठिकानों पर ईरान के जवाबी हमलों ने स्थिति को और खराब कर दिया है, जिससे 6 अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई, जिसके बाद अमेरिका को अपने नागरिकों को मध्य पूर्व से तुरंत निकलने का निर्देश देना पड़ा।
संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रति नाराजगी: लोग अब इस बात से थक चुके हैं कि कैसे अमेरिका बिना किसी सीमा (असीमित युद्ध) के क्षेत्र को अस्थिर कर रहा है।

कुल मिलाकर ईरान-इजराइल संघर्ष में अमेरिका की प्रत्यक्ष भागीदारी ने न केवल उसे अरब सहयोगियों से दूर कर दिया है, बल्कि अपने ही देश में भी एक बड़े जन-आक्रोश का सामना करना पड़ रहा है, जहां लोग इस ‘अनंत युद्ध’ को बंद करने की मांग कर रहे हैं।

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