आखिर महिला आरक्षण से परिसीमन का क्या सम्बन्ध है ?

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New Delhi, Aug 02 (ANI): Samajwadi Party (SP) MP Jaya Bachchan, Shiv Sena (Uddhav Balasaheb Thackeray) MP Priyanka Chaturvedi, Jharkhand Mukhti Morcha (JMM) MP Mahua Manjhi and other MPs at the Parliament House complex during the Monsoon Session, in New Delhi on Wednesday. (ANI Photo/Sanjay Sharma)


अखिलेश अखिल

महिला आरक्षण का कानून अभी बनेगा और उसका लाभ महिलाओं को 2029 के चुनाव में मिलेगा यह बात तो साफ़ हो गया है। जबताक आगामी जनगणना नहीं हो जाता और उसके बाद परिसीमन पूरा नहीं हो जाता तब तक महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें चिन्हित नहीं की जा सकती। ऐसे में यह जानना जरुरी है कि आखिर यह परिसीमन क्या है ?         
      लोकतंत्र में आबादी का एक समान प्रतिनिधित्व हो सके इसलिए परिसीमन किया जाता है। राज्यों की आबादी समय-समय पर बदलती रहती है। ऐसे में जनसंख्या बढ़ने के बाद भी सभी का समान प्रतिनिधित्व हो सके इसलिए भी निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण किया जाता है।  लोकसभा क्षेत्रों का हर राज्य की जनसंख्या के अनुपात में विभाजन करना जरूरी होता है और यही नियम विधानसभाओं पर भी लागू होता है।  संविधान में भी जनगणना के बाद परिसीमन को लेकर प्रावधान है।   
 अनुच्छेद 82 में हर राज्य के लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के निर्धारण का जिक्र किया गया है।  वहीं, आर्टिकल 81, 170, 330 और 332, जिनमें सीटों के आरक्षण का जिक्र है, उनमें भी यह बात कही गई है. परिसीमन का काम एक स्वतंत्र परिसीमन आयोग द्वारा किया जाता है, जिसका फैसला ही आखिरी होता है। किसी कोर्ट में इसे चुनौती नहीं दी जा सकती। 
                     एक बड़ा सवाल यह भी है कि आखिर दक्षिण राज्य परिसीमन का विरोध क्यों कर रहे हैं, क्या इससे उन्हें कोई नुकसान होगा? दक्षिण राज्य में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और जागरूकता की वजह से जनसंख्या नियंत्रित हुई है, जबकि हिंदी बेल्ट के राज्यों में जनसंख्या तुलनात्मक रूप से बढ़ी है।  फिलहाल, दक्षिण से लोकसभा में 129 सदस्य चुने जाते हैं, जबकि सिर्फ उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड से ही 134 सांसद चुने जाते हैं।  ऐसे में परिसीमन के जरिए जब निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण किया जाएगा तो जनसंख्या वृद्धि के कारण हिंदी भाषी राज्यों में निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या भी बढ़ जाएगी। 1951 में हुई जनगणना के बाद लोकसभा सीटों की संख्या 489 से बढ़कर 494 हुई, 1961 में यह संख्या 522 और 1971 के बाद 543 हो गई। यही वजह है कि दक्षिण भारत परिसीमन का विरोध कर रहा है। और यह समस्या तब आएगी ही। ज्यादा आबादी वाले राज्यों में लोकसभा और विधान सीट की संख्या काफी बढ़ जाएगी जबकि दक्षिण के काम आबादी वाले राज्यों की सीट संख्या में मामूली बढ़ोतरी होगी।    
      बता दें कि  आजादी के बाद से अब तक 7 बार जनगणना हुई, लेकिन परिसीमन सिर्फ चार 1952, 1963, 1973 और 2002 में ही हो सका।  हालांकि, आखिरी बार जब 2002 में परिसीमन हुआ था तो निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या में कोई बदलाव नहीं हुआ था यानी 1971 से लोकसभा सदस्यों की संख्या 543 ही है। 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी 42वां संविधान संशोधन विधेयक बिल लेकर आई थीं, जिसमें 2001 तक निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्निधारण पर रोक लगाने का प्रस्ताव था। उन्होंने फैमिली प्लानिंग को बढ़ावा देने का हवाला देते हुए संसद में यह प्रस्ताव दिया था। 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 91वां संविधान संशोधन विधेयक पेश कर इस रोक को 2026 तक बढ़ाने का प्रस्ताव दिया। पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी ने भी जनसंख्या स्थिरीकरण एजेंडे का हवाला देकर रोक को बरकरार रखा था। 
      अब एक नजरव महिला आरक्षण पर। इस बात की संभावना ज्यादा बढ़ गई है कि वर्षों से पेंडिंग महिला  आरक्षण बिल पास हो जाएगा और देश की आबादी को उनका हक़ भी मिल जाएगा। बुधवार को लोकसभा में यह बिल पास हो गया। हालांकि इस बिल को लेकर काफी बहस भी हुई कई तरह की मांगे भी रखी गई। खासकर ओबीसी के लिए भी इस आरक्षण में सीटें निर्धारित करने की मांग की गई ,विपक्ष के अधिकतर नेताओं ने इसकी मांग की। यह बात और हैं कि सत्ता पक्ष के लोग आज भले ही ओबीसी आरक्षण के मामले में चुप हैं लेकिन इतना तय है कि आने वाले समय में इसको लेकर फिर से विवाद खड़ा होगा और फिर से इस कानून में संशोधन की बात भी होगी।
     लोकसभा से बिल पास होने के बाद आज राज्य सभा में भी इस बिल को पेश किया गया है। अभी इस बिल पर काफी चर्चा चल रही है। लगभग सभी दलों ने महिला आरक्षण का सपोर्ट किया है। जो दल कल तक इस बिल के खिलाफ में थे आज सभी सपोर्ट में खड़े हैं। वजह है देश की बदलती राजनीति। उम्मीद की जा रही है कि आज राज्य सभा में भी यह बिल पास हो जाएगा। और ऐसा हुआ तो मोदी सरकार की यह बड़ी उपलब्धि होगी। यह बात और है कि यह बिल कांग्रेस के जमाने से ही विवाद का विषय बना हुआ था। मनमोहन सिंह के समय में राज्य सभा से इस बिल को पास भी कराया गया था लेकिन तब  बीजेपी समेत कई दलों ने इसका विरोध किया था। लेकिन आज बीजेपी की सरकार ही यह बिल पास करा रही है। ऐसे में इस बिल का श्रेय भी बीजेपी को ही मिल सकता है।
      लेकिन मजे की बात है कि बिल पास होने के बाद भले ही तुरंत यह कानून भी बन जाए लेकिन कमसे काम इस चुनाव में इस कानून का लाभ महिलाओं को नहीं मिल सकेगा। इसके लिए बिल में कई तरह की शर्ते भी लगाईं गई है। कानून को अमल में लाने के लिए जनगणना और परिसीमन की जरुरत है। वैसे भी 2026 में परिसीमन कराने की बात थी ताकि बढ़ती आबादी के साथ ही लोकसभा और विधान सभा की सीटों का इजाफा किया जाए। इसी को देखते हुए ही नए संसद भवन का निर्माण भी किया गया है।
     महिला आरक्षण का कानून भले ही अभी बन जाए लेकिन इसकी राह में जो रोड़े  हैं वह परिसीमन के बाद ही ख़त्म होगा। संभव है कनून को अमल में लाने के लिए 2029 से लेकर 2034 तक भी महिलाओं को इन्तजार करना पड़े। बिल में साफ तौर पर कहा गया है कि जनगणना के आंकड़ों के बाद ही परिसीमन की प्रक्रिया शुरू होगी। यही बिल तभी लागू होगा जब ये दोनों प्रक्रिया पूरी हो जाएगी।
    

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