सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (5 जनवरी, 2026) को पीड़ित पक्ष के कहने पर न्यायिक अधिकारियों पर तुच्छ आरोप लगाए जाने की प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताई और जोर देकर कहा कि ऐसे अधिकारियों की सुरक्षा जरूरी है। कोर्ट ने मध्य प्रदेश के एक न्यायिक अधिकारी की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए यह बात कही। अधिकारी पर आबकारी अधिनियम के तहत आरोपियों को जमानत देने में अलग-अलग मापदंड अपनाने और भ्रष्टाचार में लिप्त होने का आरोप था।
जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि न्यायिक अधिकारी को 27 साल तक न्यायपालिका में बेदाग सर्विस रिकॉर्ड के साथ काम करने के बावजूद समुचित प्रक्रिया का पालन किए बिना ही सेवा से हटा दिया गया।
एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कोर्ट ने अधीनस्थ न्यायपालिका के न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ पीड़ित पक्षों के कहने पर तुच्छ आरोप लगाए जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताई और कहा कि इसी वजह से अधीनस्थ न्यायपालिका के अधिकारी जमानत देने से हिचकते हैं और हाई कोर्ट्स और सुप्रीम कोर्ट पर जमानत याचिकाओं का बोझ बढ़ जाता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि कि भ्रष्ट आचरण में लिप्त न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई सहित कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। बेंच ने कहा कि बार के सदस्य भी न्यायपालिका के सदस्यों के खिलाफ तुच्छ आरोप लगाने में लिप्त रहते हैं।कोर्ट ने ऐसा करने वालों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई किए जाने की चेतावनी दी।
जस्टिस विश्वनाथन ने कहा कि हाई कोर्ट्स को सिर्फ विरोधी न्यायिक आदेशों के कारण न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करते समय सावधानी बरतनी चाहिए।जस्टिस पारदीवाला ने फैसले से सहमति जताते हुए जस्टिस विश्वनाथन के लिखे फैसले की सराहना की और कहा कि यह बहुत साहसिक फैसला है, जो ईमानदार न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में काफी मदद करेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश के न्यायिक अधिकारी निर्भय सिंह सुलिया को उनकी सेवानिवृत्ति तक पूर्ण मौद्रिक लाभ देने का निर्देश दिया और सितंबर, 2015 के बर्खास्तगी के आदेश और उनकी सेवा समाप्ति को बरकरार रखने संबंधी हाईकोर्ट के फैसले को भी रद्द कर दिया।
