न्यूज़ डेस्क
बीजेपी की मौजूदा सरकार शिक्षण व्यवस्था से जुड़ी एनसीईआरटी पाठ्य पुस्तक में लगातार बदलाव करती जा रही है ।कई पुरानी जानकारी को हटाने की कोशिश की जा रही है तो कई महान हस्तियों के पन्ने हटाए जा रहे हैं ।ये बदलाव सभी पाठ्यपुस्तको में किए जा रहे है ।खासकर इतिहास और राजनीतिक विज्ञान से जुड़े पाठ्य सामग्री में हो रहे बदलाव को लेकर विरोध भी दर्ज किए जा रहे हैं लेकिन सरकार यही कह रही है सिलेबस को आसान और सरल किया जा रहा है ।लेकिन सवाल है कि जिनका इतिहास और आधुनिक भारत में योगदान रहा है उनसे जुड़े पन्नो को हटाने से सरकार को क्या लाभ मिल रहा है ?
अब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने बीजेपी पर भारत के पहले शिक्षा मंत्री और भारत रत्न, मौलाना अबुल कलाम आजाद का नाम इतिहास से मिटाने का प्रयास करने का आरोप लगाया है ।एनसीपी ने कहा है कि क्योंकि वह मुसलमान थे इसलिए बीजेपी भेदभाव कर रही है । एनसीपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता क्लाइड क्रास्टो ने कहा कि केंद्र की बीजेपी नीत सरकार मौलाना आजाद की पहचान और भारत की शिक्षा व्यवस्था से उनके गौरवपूर्ण योगदान को मिटाने के लिए एनसीईआरटी इस्तेमाल कर रही है।
एनसीपी नेता ने उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा कि ग्यारहवीं कक्षा की पुरानी एनसीईआरटी राजनीति विज्ञान की पाठ्यपुस्तक के पहले अध्याय के एक पैरा में कहा गया है, संविधान सभा में विभिन्न विषयों पर आठ प्रमुख समितियां थीं। आमतौर पर, जवाहरलाल नेहरू, राजेंद्र प्रसाद, सरदार पटेल, मौलाना आजाद या अंबेडकर इन समितियों की अध्यक्षता करते थे। हालांकि, एनसीईआरटी द्वारा उसी पाठ्यपुस्तक के नए संस्करण में मौलाना आजाद का नाम हटा दिया गया है और वही अध्याय में अब पढ़ा जाता है — ‘आमतौर पर, जवाहरलाल नेहरू, राजेंद्र प्रसाद, सरदार पटेल या बी.आर. अंबेडकर इन समितियों की अध्यक्षता करते थे’। यह वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण है।
मौलाना आजाद को इतिहास से हटाने की एक व्यवस्थित साजिश पर संदेह करते हुए, एनसीपी नेता ने बताया कि कैसे पिछले साल अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने ‘मौलाना आजाद फैलोशिप’ को अचानक बंद कर दिया था, जिसे 2009 में (पूर्व यूपीए सरकार द्वारा) पांच साल की अवधि के लिए छह अधिसूचित अल्पसंख्यकों के छात्रों को वित्तीय मदद प्रदान करने के लिए शुरू किया गया था।
एनसीपी नेता ने आगे कहा कि एनसीईआरटी भारत सरकार के अधीन आता है, जिसका नेतृत्व वर्तमान में बीजेपी कर रही है, और इसलिए मन में यह सवाल आता है कि क्या वे भारत के पहले शिक्षा मंत्री के नाम को उसके धर्म के कारण मिटाना चाहते हैं। उन्होंने आगे कहा कि स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री और हमारे प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में से एक के साथ ऐसा करने का कोई अन्य कारण प्रतीत नहीं होता है। एनसीईआरटी को स्पष्ट करना चाहिए और नागरिकों को जवाब देना चाहिए कि मौलाना आजाद का नाम पाठ्यपुस्तक के नए संस्करण में क्यों नहीं है, और यह इस त्रुटि को कैसे सुधारेगा।
बता दें कि मौलाना आजाद एक प्रतिष्ठित इस्लामिक विद्वान, लेखक, शिक्षाविद और एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्हें 35 वर्ष की आयु में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सबसे कम उम्र के अध्यक्ष के रूप में चुना गया था, और बाद में उन्होंने ऐतिहासिक खिलाफत आंदोलन का नेतृत्व किया था। स्वतंत्रता के बाद, मौलाना आजाद ने 10 वर्षों से अधिक समय तक भारत के पहले शिक्षा मंत्री के रूप में कार्य किया, जिसके दौरान उन्होंने देश के विशाल शैक्षणिक नेटवर्क की नींव रखी।

