अखिलेश अखिल
नीतीश कुमार अचानक मंगलवार को दिल्ली पहुँच गए। लोगों ने कहा कि अचानक दिल्ली क्यों आये ? मीडिया वाले भी परेशान हुए। पटना से दिल्ली तक की राजनीति गर्म हो गई। लेकिन सच तो यही है कि राजनीति में कुछ भी अचानक नहीं होता। सब तय समय पर ही होता है। नीतीश के दिल्ली आने का समय भी तय किया गया था। वे दिल्ली पहुँच गए। देर शाम को लालू यादव से मुलाकात किये। मुस्कुराये और पत्रकारों को यही कहा कि कुछ दिनों में सब पता चल जाएगा। प्रेस वार्ता में सब बातें होगी। बहुत कुछ होगा। सन्देश साफ़ था कि नीतीश कुमार से मिलकर इस बार कोई बड़ा फैसला कांग्रेस करने जा रही है।
राहुल गांधी की सांसदी जाने के बाद अब नीतीश की राह आसान होती दिख रही है। इस बार कांग्रेस भी विपक्षी एकता के लिए आतुर है, जिसके लिए नीतीश बार-बार विभिन्न मंचों से अपील कर रहे थे। अब कुछ परिस्थितियां अनुकूल देख नीतीश अलग-अलग मुलाकात करेंगे, फिर कॉमन मीटिंग की तारीख तय होगी। पहले नीतीश के सोमवार को ही तीन दिनों के लिए दिल्ली जाने का कार्यक्रम था, लेकिन जनता दरबार, कोरोना पर उच्चस्तरीय बैठक और कैबिनेट में शिक्षक भर्ती को लेकर अहम फैसले की व्यस्तता में मंगलवार शाम दिल्ली पहुंचने का कार्यक्रम बना।
राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव से नीतीश कुमार मिल चुके हैं। उनके दिल्ली पहुँचने से पहले लालू प्रसाद बहुत कुछ फील्डिंग कर चुके थे। मुलाकात के बाद दोनों मुस्कुराते हुए तस्वीर खिंचवाई और फिर कहा शांत रहिये। खेल देखिये। इतना भर कहना था कि बहुत कुछ कहानी आगे बढ़ने लगी। यह कहानी कहाँ तक जाएगी अभी कुछ भी नहीं कहा जा सकता। आज नीतीश की बैठक खड़गे के साथ होनी है। नीतीश कुमार के ताजा दौरे में बुधवार को शरद पवार से मिलने और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से बात करने की भी योजना बताई जा रही है। मुलाकातों और बातों के दौरान कई जगह उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के भी साथ होने की उम्मीद है। पिछले दौरे में तेजस्वी दिल्ली में केजरीवाल से मिल आए थे।
विपक्षी एकता के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रयास को पिछली बार पलीता लग गया था। उन्होंने बाकी प्रमुख विपक्षी दलों को तो लगभग मिला लिया, लेकिन एक तरफ कांग्रेस का रिस्पांस नहीं मिल रहा था और दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस किनारे खड़ी रही थी। लेकिन, इस बार नीतीश बहुत उम्मीद के साथ आये हैं। उम्मीद इसलिए है, क्योंकि अब सभी विपक्षी दलों को बीजेपी से लगभग बराबर की पीड़ा महसूस हो रही है। कुछ हालिया घटना पर नजर डाले तो सब पता चल सकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र की बीजेपी सरकार को हटाना कांग्रेस की पहली और अंतिम ख्वाहिश है, लेकिन उसे राहुल के अलावा किसी का नेतृत्व स्वीकार नहीं हो रहा था। अब ‘मोदी’ कांड में सांसदी जाने के बाद कांग्रेस विकल्पहीन स्थिति में भी है और सबसे बड़े दर्द को भी झेल रही है। महागठबंधन की बिहार के पूर्णिया की रैली और उसके बाद भी नीतीश कांग्रेस का साथ मांग रहे थे, लेकिन अब तक चुप रही पार्टी इस समय आगे नजर आ रही है।
दिल्ली के बाद पंजाब की सरकार में काबिज आम आदमी पार्टी को अब राष्ट्रीय दर्जा मिल गया है। सफलता की इन बातों के साथ आप के लिए इस समय मुसीबतों की भी लाइन लगी है। एक-एक कर अरविंद केजरीवाल के कई करीबी नेताओं को जेल की राह दिखाई जा चुकी है। केजरीवाल नरेंद्र मोदी सरकार के दिल्ली में दखल से भी परेशान रहते हैं। इसलिए, आप के खाते में कई तरह का दर्द है।
पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस को उखाड़ फेंकने में एड़ी-चोटी का जोर लगाया था। उस समय मिले दर्द पर ममता बनर्जी ने मरहम तो खुद लगा लिया, लेकिन केंद्र सरकार की दखलंदाजी से वह कभी भी राहत में नहीं है। खासकर बांग्लादेशी घुसपैठियों पर केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार का स्टैंड बिल्कुल उलट है।
राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद का तो पूरा परिवार घोटालों के कारण पेशी और पूछताछ से परेशान है। इसलिए, तेजस्वी समेत लालू का पूरा परिवार केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ खड़ा है। लालू परिवार खड़ा है तो राजद में किसी दूसरी आवाज की आशंका भी नहीं। यही कारण है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार भले नहीं कह रहे, लेकिन तेजस्वी यादव को बिहार की कुर्सी दिलाने के लिए राजद खुले मन से नीतीश को दिल्ली भेजने में लगा हुआ है। राजद के विभिन्न मंचों से नीतीश को पीएम मैटेरियल कहा जा रहा है।
कांग्रेस के सामने चुनौती है कि उसके पास कोई बड़ा ऐसा चेहरा नहीं है जो पीएम मोदी के सामने खड़ा हो सके। हालांकि कांग्रेस आज भी चाहत रखती है कि राहुल गाँधी उम्मीदवार बने। लेकिन कांग्रेस के इस खेल से कई दल भागते नजर आते हैं। कई विपक्षी दलों को राहुल से परहेज है लेकिन कांग्रेस से नहीं। ऐसे में नीतीश कुमार को आगे किया जा सकता है। उन्हें पीएम उम्मीदवार भी बनाया जा सकता है या फिर विपक्षी दलों को एक करने की जिम्मेदारी भी दी जा सकती है है। जो काम अभी तक सोनिया गाँधी कर रही थी वह काम अब नीतीश कुमार भी कर सकते हैं।

