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ढहता लोकतंत्र : छतीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह पर भी कार्रवाई नहीं हुई ! 

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अखिलेश अखिल 
याद कीजिये गुजरात चुनाव के समय छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता डॉ. रमन सिंह के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। उन्होंने डॉ. रमन सिंह और उनके बेटे की संपत्ति को लेकर  आठ नवंबर को प्रवर्तन निदेशालय को चिट्ठी भी लिखी थी। मुख्यमंत्री बघेल ने पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के खिलाफ इसी महीने की शुरुआत में ईडी को शिकायत की लेकिन ईडी आज तक मौन है। तब भूपेश बघेल ने कहा था कि अगर रमन सिंह के खिलाफ ईडी जांच नही करती है तो वे अदालत की रुख करेंगे।

जानकारी के अनुसार, प्रवर्तन निदेशालय को लिखी चिट्ठी में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने आरोप लगाया गया है कि पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह और उनके बेटे की संपत्ति 1500 गुना की बढ़ोतरी कैसे हो गई। प्रवर्तन निदेशालय उनकी संपत्ति में हुई बढ़ोतरी को लेकर जांच क्यों नहीं करता। ईडी को लिखी चिट्टी में भूपेश बघेल ने कहा है कि छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और उनके बेटे की अकूत संपत्ति की जांच की जाए, ताकि राज्य की जनता को नान घोटाले सहित पनामा मामले में हुए भ्रष्टाचार की सारी सच्चाई पता चल सके।

भूपेश बघेल ने यह आरोप भी लगाया है कि डॉ. रमन सिंह की संपत्ति नान घोटाले के बाद अचानक इतनी ज्यादा बढ़ गई, जिसका कोई भी साक्ष्य उनके पास नहीं है। चिट्टी में आरोप लगाया गया हैं कि नान घोटाला डॉ. रमन सिंह के कार्यकाल में हुआ। इस भ्रष्टाचार का एक बड़ा हिस्सा डॉ. रमन सिंह के हिस्से में भी आया। बघेल ने अपनी चिट्ठी में सीएम मैडम और सीएम चिंतामणि का जिक्र करते हुए कहा कि ईडी आखिर किसके दबाव में इसकी जांच नहीं कर रही है।

बता दें कि छत्तीसगढ़ राज्य नागरिक आपूर्ति निगम रायपुर में नान घोटाला प्रकाश में आया था। इस घोटाले को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह सरकार के अनेक वरिष्ठ अधिकारियों और कर्मचारियों पर गाज गिरी थी। कांग्रेस शुरू से ही नान घोटाले के केंद्र में रमन सिंह और उनके परिवार के लोगों की भूमिका अहम बता रही है। अब छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और उनके परिवार के खिलाफ मोर्चा खोलने के बाद कयास यह लगाया जाने लगा है कि सीएम बघेल द्वारा ईडी को लिखी गई चिट्ठी के बाद भाजपा को आने वाले चुनावों में भारी नुकसान हो सकता है।

अभी तक यही माना जाता था कि किसी की शिकायत या फिर स्वतः संज्ञान के आधार पर कोई भी जांच एजेंसियां काम करती है। इसके साथ ही अदालत के आदेश पर जांच होती है। लेकिन अब ऐसा होता नहीं दिखता। जांच के दायरे में अभी वही लोग हैं जो या तो बीजेपी के खिलाफ है या फिर विपक्ष में शामिल हैं। सरकार का आदेश मिलते ही जांच एजेंसियां टूट पड़ती है और फिर सामने वाले को पस्त कर देती हैं। लोकतंत्र  का यह खेल लुभाता भी है और भरमाता भी है।

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