सचिन वाझे जमानत का रहस्य, वही जज चकोर, वही सबूत, लेकिन बिल्कुल विपरीत आदेश

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एंटीलिया–मनसुख हिरेन मामले के आरोपी एवं पूर्व पुलिस अधिकारी सचिन वाझे को जमानत देने वाले विशेष न्यायाधीश चकोर एस. बाविस्कर के खिलाफ जेन-ज़ी लॉयर्स एसोसिएशन के संयोजक अधिवक्ता देवकृष्ण भांबरी ने बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष विस्तृत शिकायत दाखिल कर गंभीर कार्रवाई की मांग की है।

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि 29 सितंबर 2026 को सचिन वाजे को जमानत देने वाला आदेश, सुप्रीम कोर्ट और बॉम्बे हाईकोर्ट के बाध्यकारी निर्णयों तथा स्वयं उसी न्यायाधीश द्वारा कुछ ही समय पहले दर्ज किए गए निष्कर्षों के विपरीत है।

शिकायत का सबसे गंभीर आधार उसी न्यायाधीश द्वारा महज ढाई महीने के भीतर दर्ज किए गए परस्पर विरोधी निष्कर्ष हैं।

15 जुलाई 2026 को सचिन वाझे की डिस्चार्ज अर्जी खारिज करते हुए न्यायाधीश ने अनेक गवाहों के बयान, मोबाइल संपर्क, CDR, टावर लोकेशन, CCTV फुटेज तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक और फॉरेंसिक सामग्री का उल्लेख करते हुए रिकॉर्ड पर “huge evidence” होने की बात कही थी।

सबसे महत्वपूर्ण यह कि उसी आदेश के पैरा 20 में न्यायाधीश ने स्पष्ट शब्दों में कहा था—

“I do not have any hesitation or even the slightest doubt that, more than sufficient material exists on record to frame the charge…”

अर्थात आरोप तय करने के लिए पर्याप्त सामग्री होने पर न्यायाधीश को “जरा भी संदेह” नहीं था, बल्कि उनके अनुसार रिकॉर्ड पर “more than sufficient material” मौजूद था।

इसके बाद 1 अगस्त 2026 को इसी न्यायाधीश ने सचिन वाझे के खिलाफ आरोप तय किए।

लेकिन 29 सितंबर के जमानत आदेश के पैरा 49 में इसी न्यायाधीश ने बिल्कुल उलट रुख अपनाते हुए कहा कि सचिन वाझे के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं है; आरोप कम-से-कम अभियोजन को अपना मामला साबित करने का अवसर देने के लिए तय किए गए थे और अन्यथा मामला “shut at the threshold”, यानी दहलीज पर ही बंद हो सकता था।

यह टिप्पणी उसी न्यायाधीश के 15 जुलाई के “huge evidence” और “more than sufficient material” वाले स्पष्ट निष्कर्ष के बिल्कुल विपरीत है। शिकायत के अनुसार, कानून न्यायाधीश को इस प्रकार परस्पर विरोधी भूमिका अपनाने की अनुमति नहीं देता, बल्कि ऐसा आचरण BNS की धाराओं 256 और 257 के तहत अपराध है, जिनमें संबंधित अपराधों के लिए तीन वर्ष से सात वर्ष तक की सजा का प्रावधान है।

सवाल बेहद गंभीर और सीधा है—आखिर महज ढाई महीने में ऐसा क्या बदल गया? 15 जुलाई को जिस मामले में इसी न्यायाधीश को सचिन वाझे के खिलाफ “huge evidence”, “more than sufficient material” दिखाई दे रहा था और सबूतों की पर्याप्तता को लेकर “not even a slightest doubt” था, वही मामला 29 सितंबर आते-आते इतना कमजोर कैसे हो गया कि न्यायाधीश को कहना पड़ा कि अन्यथा केस “shut at the threshold” हो सकता था?

यह सवाल इसलिए और गंभीर हो जाता है क्योंकि 1 अगस्त को इसी न्यायाधीश ने सचिन वाझे के खिलाफ आरोप भी तय कर दिए थे। आरोप तय करने के बाद ट्रायल कोर्ट स्वयं अपने पहले आदेश पर इस प्रकार वापस जाकर आरोपी को discharge करने की स्थिति में नहीं होता।
शिकायत में एक और गंभीर तथ्य सामने रखा गया है। सचिन वाझे इससे पहले बॉम्बे हाईकोर्ट गया था और अपराध तथा cognizance को रद्द करने सहित कई राहतें मांगी थीं। हाईकोर्ट ने वह याचिका खारिज कर दी थी।

15 जुलाई के आदेश में इसी तथ्य को दर्ज करते हुए विशेष न्यायाधीश ने स्वयं कहा था—

“certainly this Court cannot at all grant those reliefs to him.”

इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा था कि वाझे की डिस्चार्ज अर्जी का परिणाम खारिज होने के अलावा और कुछ हो ही नहीं सकता था।

ऐसे में बाद के जमानत आदेश में उसी न्यायाधीश द्वारा अपनाया गया बिल्कुल विपरीत दृष्टिकोण शिकायत में गंभीर जांच का विषय बताया गया है।
जमानत आदेश के पैरा 6 में न्यायाधीश ने स्वयं दर्ज किया कि आरोपी के वकील और NIA के Special Public Prosecutor—दोनों ने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों पर भरोसा किया था।

जज ने स्वयं लिखा—

“I always feel honoured to be happily abided by each and every precedent…”

लेकिन शिकायत का आरोप है कि पूरे 33 पन्नों के आदेश में NIA की ओर से दिए गए महत्वपूर्ण फैसलों, उनके ratio और उन्हें लागू अथवा अलग करने के कारणों पर चर्चा ही नहीं की गई।
सचिन वाझे को जमानत देने वाले 33 पन्नों के आदेश को लेकर शिकायत में एक और गंभीर सवाल उठाया गया है—जब NIA ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के महत्वपूर्ण बाध्यकारी फैसले अदालत के सामने रखे थे, तो अंतिम जमानत आदेश में उन फैसलों, उनके ratio और मौजूदा मामले में उनकी applicability पर विचार आखिर कहां है?

जमानत आदेश के पैरा 6 में न्यायाधीश ने स्वयं दर्ज किया कि आरोपी के वकील और NIA के Special Public Prosecutor—दोनों ने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों पर भरोसा किया था। इतना ही नहीं, न्यायाधीश ने स्वयं लिखा—

“I always feel honoured to be happily abided by each and every precedent…”

लेकिन शिकायत का आरोप है कि इस स्पष्ट घोषणा के बावजूद पूरे 33 पन्नों के आदेश में NIA द्वारा पेश महत्वपूर्ण और बाध्यकारी फैसलों के ratio पर कोई प्रभावी चर्चा नहीं की गई। आदेश में यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि prosecution द्वारा cited precedents मौजूदा मामले में क्यों लागू नहीं होते, किन तथ्यों के आधार पर वे distinguishable थे, अथवा उन्हें स्वीकार न करने का कानूनी आधार क्या था।

शिकायत का कहना है कि यह केवल किसी citation का उल्लेख छूट जाने का सामान्य मामला नहीं है। जब किसी पक्ष द्वारा binding precedent विशेष रूप से अदालत के संज्ञान में लाया जाता है, तो अदालत उसे चुपचाप नजरअंदाज नहीं कर सकती। उसके applicable ratio पर विचार करना और यदि वह लागू नहीं है तो उसके लिए न्यायसंगत कानूनी कारण दर्ज करना judicial discipline का आवश्यक हिस्सा है। इसी proposition के समर्थन में शिकायत में Ratilal Jhaverbhai Parmar, Yogesh Waman Athavale, Legrand (India) और Garware Polyester सहित कई निर्णयों का सहारा लिया गया है।

इस मुद्दे पर Bombay High Court का Yogesh Waman Athavale v. Vikram Abasaheb Jadhav निर्णय विशेष रूप से महत्वपूर्ण बताया गया है। उस मामले में हाईकोर्ट ने पाया था कि संबंधित आदेश cited authorities पर खामोश था और यह स्पष्ट नहीं था कि उन फैसलों पर विचार किया गया या नहीं। हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि केवल judgments का उल्लेख कर देना पर्याप्त नहीं है; न्यायिक अधिकारी को उनका ratio समझकर यह स्पष्ट करना चाहिए कि वह मौजूदा मामले में लागू होता है या नहीं। संबंधित न्यायिक अधिकारी के कामकाज की निगरानी तक के निर्देश दिए गए थे।

शिकायत में Baradakant Mishra v. Registrar of Orissa High Court, (1973) 1 SCC 374 का भी हवाला दिया गया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने जानबूझकर हाईकोर्ट के पूर्व निर्णय का पालन न करने को न्याय प्रशासन में भ्रम पैदा करने और हाईकोर्ट की संवैधानिक authority को कमजोर करने वाला आचरण माना था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि binding law की deliberate और mala fide अवहेलना contempt के सिद्धांतों के दायरे में आ सकती है।

इसी तरह शिकायत में New Delhi Municipal Council v. Prominent Hotels Limited का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि judicial discipline न्यायिक व्यवस्था के मूल स्तंभों में से एक है और अदालत के सामने रखे गए binding judgments की “conscious disregard” को केवल साधारण चूक मानकर नहीं छोड़ा जा सकता।

शिकायत का आरोप इसलिए और गंभीर बताया गया है क्योंकि मामला केवल NIA के precedents पर चुप्पी तक सीमित नहीं है। शिकायत के अनुसार, एक तरफ prosecution द्वारा विशेष रूप से पेश binding authorities पर विचार नहीं किया गया, जबकि दूसरी तरफ उसी आरोपी और उसी prosecution material को लेकर न्यायाधीश के पहले के स्पष्ट निष्कर्षों से materially inconsistent reasoning बाद के bail order में अपनाई गई। शिकायत इसी cumulative conduct को contempt, criminal और disciplinary scrutiny की मांग का आधार बनाती है
शिकायत में कहा गया है कि गंभीर अपराधों में आरोपी पुलिस अधिकारियों को जमानत देने के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही विशेष रूप से कठोर सिद्धांत निर्धारित कर चुका है।

Prakash Kadam v. Ramprasad Vishwanath Gupta में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी पुलिस अधिकारियों के संदर्भ में तीखी टिप्पणी की थी—

“Thus, the protectors have become the predators.”

उस मामले में पुलिस अधिकारियों को दी गई जमानत रद्द करने का आदेश बरकरार रखा गया था। Edited complaint against NIA Ju…

इसी प्रकार State of Jharkhand v. Sandeep Kumar में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब आरोपी स्वयं जांच अधिकारी या पुलिस अधिकारी हो और उस पर पद के दुरुपयोग का आरोप हो, तब सामान्य आरोपी पर लागू होने वाले विचारों को उसी तरह लागू नहीं किया जा सकता। अधिकारी के निलंबित होने और चार्जशीट दाखिल हो जाने के बावजूद गवाहों और सबूतों को प्रभावित करने की उसकी क्षमता महत्वपूर्ण बनी रह सकती है।

शिकायत में 2026 के State of Maharashtra v. Rahul Datta Bhosale तथा Jitendra Singh v. State of U.P. का भी सहारा लिया गया है।
शिकायत के अनुसार सचिन वाझे मनसुख हिरेन हत्या एवं कथित cover-up के मामले में अभियोजन का सामना कर रहा है तथा ख्वाजा यूनुस मामले में भी उस पर आरोप हैं।

इसके अतिरिक्त शिकायत में कहा गया है कि 13 सितंबर 2026 को CBI द्वारा दर्ज एक नई FIR में दिशा सालियन की कथित हत्या सहित कई हत्याओं और cover-up से संबंधित आरोपों में भी वाझे का नाम है।
शिकायत में विशेष रूप से S. Nirki, Principal District Judge, Wardha v. R. A. Khan, Magistrate, Wardha, 1993 Cri LJ 816 का उल्लेख किया गया है।

उस मामले में उच्चतर अदालतों द्वारा आरोपी को राहत पहले ही अस्वीकार किए जाने के बावजूद उसके विपरीत राहत देने वाले न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू की गई थी।

इसका सिद्धांत स्पष्ट है—कोई अधीनस्थ अदालत किसी दूसरे रास्ते से उच्चतर अदालत के आदेश को निष्प्रभावी नहीं कर सकती। शिकायत में तर्क दिया गया है कि यही सिद्धांत मौजूदा मामले पर भी लागू होता है।

ऐसे कई अन्य न्यायिक निर्णय भी हैं, जिनमें बाध्यकारी न्यायिक मिसालों (binding precedents) के विरुद्ध कार्य करने वाले न्यायाधीशों को अवमानना का दोषी ठहराया गया है।

बाध्यकारी न्यायिक मिसालों की जानबूझकर अवहेलना करते हुए और उनके सीधे विपरीत न्यायिक आदेश पारित करना भ्रष्ट आचरण (corrupt practice), विधिक दुर्भावना (malice in law), शक्ति के साथ धोखाधड़ी (fraud on power), न्यायिक दुस्साहस (judicial adventurism), न्यायिक शपथ का उल्लंघन तथा गंभीर न्यायिक कदाचार (gross judicial misconduct) माना जाता है।

कानून के स्थापित सिद्धांत इस प्रकार बाध्यकारी कानून की जानबूझकर अवज्ञा को “न्यायिक बेईमानी का सबसे घोर रूप” (the grossest form of judicial dishonesty), “विधिक दुर्भावना” (legal malice), “शक्ति के साथ धोखाधड़ी” (fraud on power) और “संविधान के साथ धोखाधड़ी” (fraud on the Constitution) के रूप में मान्यता देते हैं। इसे न्यायिक अथवा अर्ध-न्यायिक शक्ति के प्रयोग में भ्रष्टाचार भी माना जा सकता है, भले ही किसी बाहरी लाभ या प्रतिफल (extraneous consideration) का अलग या अतिरिक्त प्रमाण उपलब्ध न हो, यदि स्वयं न्यायिक आदेश और जिस तरीके से शक्ति का प्रयोग किया गया है, वे ऐसे कदाचार को प्रदर्शित करने वाली पर्याप्त सामग्री उपलब्ध कराते हों।

कानून यह भी मान्यता देता है कि इस प्रकृति का आचरण संबंधित प्राधिकारी की अयोग्यता (incompetence), अक्षमता (incapacity) अथवा सिद्ध कदाचार (proved misbehaviour) को दर्शा सकता है और इसके परिणामस्वरूप कठोर संवैधानिक, अनुशासनात्मक तथा, जहां लागू हो, दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
आम आदमी के लिए इस शिकायत का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि न्यायिक पद अपने-आप में आपराधिक या विभागीय जांच से पूर्ण सुरक्षा कवच नहीं है। हालांकि केवल किसी आदेश का गलत होना अपने-आप भ्रष्टाचार साबित नहीं करता; उसके लिए कानून द्वारा निर्धारित आवश्यक तत्वों और प्रमाणों की जांच जरूरी होती है।

इसी संदर्भ में शिकायत में 2012 के गाली जनार्दन रेड्डी ‘cash-for-bail’ मामले का उदाहरण दिया गया है।

तत्कालीन CBI विशेष न्यायाधीश टी. पट्टाभी रामाराव ने जनार्दन रेड्डी को जमानत दी थी। उस जमानत आदेश के बदले कथित अवैध आर्थिक लेन-देन के आरोप सामने आने के बाद संबंधित न्यायाधीश को निलंबित किया गया, Anti-Corruption Bureau ने गिरफ्तार किया और उनके खिलाफ विभागीय कार्यवाही भी शुरू हुई, ऐसा शिकायत में दर्ज है।
तक्रार में BNS की धारा 257 का भी सहारा लिया गया है। शिकायत में उद्धृत प्रावधान के अनुसार, न्यायिक कार्यवाही में कोई सरकारी सेवक भ्रष्ट या दुर्भावनापूर्ण तरीके से ऐसा आदेश, निर्णय या verdict देता है जिसे वह कानून के विपरीत जानता है, तो सात वर्ष तक की सजा का प्रावधान हो सकता है।
शिकायत में मुख्य न्यायाधीश से मांग की गई है कि 29 सितंबर के जमानत आदेश तथा उससे संबंधित पूरे न्यायिक रिकॉर्ड की जांच की जाए; NIA द्वारा प्रस्तुत लिखित दलीलें और फैसले मंगाए जाएं; 15 जुलाई का डिस्चार्ज आदेश, 1 अगस्त का charge-framing order और 29 सितंबर का bail order एक साथ जांचे जाएं।

NIA द्वारा पेश binding judgments कहां गए? हाईकोर्ट द्वारा पहले नकारी गई राहतों का क्या हुआ? आरोपी पुलिस अधिकारी होने पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कठोर मानकों का क्या हुआ? और सबसे बड़ा सवाल—एक ही रिकॉर्ड पर एक ही न्यायाधीश के दो बिल्कुल विपरीत निष्कर्ष आखिर कैसे?

अब इन सवालों का जवाब मांगने वाली शिकायत सीधे बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष पहुंच चुकी है। मामला अब केवल एक आरोपी की जमानत का नहीं, बल्कि न्यायिक अनुशासन, जवाबदेही और न्याय व्यवस्था पर आम नागरिक के विश्वास का भी बन गया है।

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