2027 के आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर कांग्रेस और बीजेपी फुल एक्शन मोड में नजर आ रही है। दोनों दल महिला वोटरों को साधने के लिए ऐड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। जहां BJP की ओर से अध्यक्ष नितिन नवीन की नई राष्ट्रीय टीम और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘नारी शक्ति’ एजेंडा सामने है,वहीं कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा अपनी बात रख रहे हैं।
अलग अलग तरीका अपना रहे दोनों दल
दोनों दल महिला वोट बैंक को साधने के लिए अलग-अलग नैरेटिव अपना रहे हैं। BJP जहां नारी शक्ति वंदन अधिनियम और संगठनात्मक पदों महिलाओं की भागीदारी के जरिए नीतिगत प्रतिनिधित्व का दावा कर रही है। वहीं कांग्रेस इसे कानूनी कोटे से आगे बढ़ाकर महिलाओं की व्यक्तिगत स्वायत्तता, पसंद की आजादी और पितृसत्तात्मक सोच को तोड़ने से जोड़ रही है।
यह राजनीतिक खींचतान 2026 में परिसीमन से जुड़े संविधान (131वां संशोधन) विधेयक के लोकसभा में पास न होने के बाद से तेज हुई है। 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों के महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए दोनों पार्टियां देश भर की महिला मतदाताओं के बीच अपनी पैठ मजबूत करने में जुटी हैं।
भारतीय राजनीति में महिलाएं अब एक स्वतंत्र और निर्णायक वोट बैंक बन चुकी हैं। पारंपरिक जातिगत और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने के अलावा पार्टियां सीधे महिला मतदाताओं का विश्वास जीतना चाहती हैं। BJP अपनी नीतियों को लागू करने वाली पार्टी के रूप में खुद को पेश कर रही है, जबकि कांग्रेस परिसीमन की शर्त पर सवाल उठाकर और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बात कर BJP के ‘नारी शक्ति’ नैरेटिव को चुनौती दे रही है।
BJP ने अपने संगठन में 46% महिला उपाध्यक्षों की नियुक्ति करके और कानूनी सुधारों का श्रेय लेकर इसे चुनावी हथियार बनाया है। इसके जवाब में कांग्रेस अपनी राज्य-स्तरीय नीतियों (जैसे 2022 में UP का ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ अभियान) और राहुल गांधी के सामाजिक-सांस्कृतिक बयानों के जरिए यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि असली सशक्तिकरण महिलाओं की अपनी मर्जी और आजादी में है, न कि सिर्फ सरकारी फैसलों में।

