पित्त की थैली यानी गॉलब्लैडर लीवर के नीचे मौजूद एक छोटी सी थैली होती है। इसमें पित्त रस जमा रहता है। यह रस खाना पचाने में मदद करता है। कई बार इसी पित्त रस में छोटे-छोटे पत्थर जैसे टुकड़े बनने लगते हैं, जिन्हें पित्त की पथरी या गॉलस्टोन कहा जाता है। पित्त की पथरी आजकल काफी आम समस्या है और यह किसी को भी हो सकती है। हालांकि, ज्यादा वजन वाले लोगों, महिलाओं और गलत खान-पान करने वालों में इसका खतरा ज्यादा हो सकता है।
पित्त रस में कोलेस्ट्रॉल और कुछ दूसरे पदार्थ होते हैं।जब इनका संतुलन बिगड़ जाता है तो पथरी बन सकती है।इसके कई कारण हो सकते हैं। पित्त रस में कोलेस्ट्रॉल ज्यादा होने पर वह धीरे-धीरे जमा होकर पथरी का रूप ले सकता है. ज्यादातर पथरियां इसी वजह से बनती हैं।
कुछ लीवर की बीमारियों में शरीर में बिलिरुबिन बढ़ सकता है। इससे भी पित्त की पथरी बनने का खतरा बढ़ जाता है। इसके साथ ही अगर पित्त की थैली पूरी तरह खाली नहीं होती, तो उसमें जमा रस गाढ़ा हो सकता है। इससे पथरी बन सकती है।आपको बता दें कि मोटापा और गलत खानपान से भी पथरी का खतरा बढ़ सकता है।
कई लोगों में छोटी पथरी होने पर कोई लक्षण नहीं दिखता।उन्हें पता भी नहीं चलता कि उनके अंदर पथरी है, लेकिन अगर पथरी किसी नली में फंस जाए, तो निम्नलिखित में से कुछ लक्षण दिखाई दे सकते हैं:
दर्द का पीठ या कंधे तक जाना।
जी मिचलाना या उल्टी होना।
खाना खाने के बाद पेट में दर्द या भारीपन होना।पेट फूलना,
खाना ठीक से न पचना,
बुखार या ठंड लगना,आंखों और त्वचा का रंग पीला पड़ना,
पेशाब का रंग गहरा होना,मल का रंग हल्का होना आदि।
अगर तेज पेट दर्द के साथ बुखार या आंखों और त्वचा का रंग पीला पड़ रहा है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे में जल्दी डॉक्टर से मिलना जरूरी है। पित्त की पथरी का पता लगाने के लिए डॉक्टर अक्सर पेट का अल्ट्रासाउंड करवाते हैं। इससे पथरी कहां है और कितनी बड़ी है, इसका पता चल सकता है। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर कुछ और जांच भी करवा सकते हैं।
कुछ आसान बातों का ध्यान रखकर पथरी का खतरा कम किया जा सकता है।
तला-भुना और ज्यादा तेल वाला खाना कम खाएं।
फल और सब्जियां ज्यादा खाएं.
खाने में फाइबर वाली चीजें शामिल करें।
रोज थोड़ा व्यायाम करें।
अपना वजन सही रखने की कोशिश करें।
अचानक बहुत तेजी से वजन कम न करें.
लंबे समय तक भूखे न रहें।
समय पर खाना खाने की कोशिश करें।

