ज्ञान, दक्षता और श्रम…. इस संवाद को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। मेक-इन-इंडिया की मंशा के पीछे सरकार या समूह के क्या दर्शन हो सकते हैं इस विवाद में परे बिना इसे समझने के लिए दूसरे ज्ञान चक्षु को भी खोलने की आवश्यकता है। श्रृष्टि और मैं को समझने के लिए हाल ही में एक रूसी करोड़पति ने फिजिसिस्ट स्टीफन हॉकिन्स की अध्यक्षता में कई मिलियन डॉलर इन्वेस्ट करने का मन बनाया है। दावे के साथ यह नहीं कहा जा सकता है कि मानव मस्तिष्क और उसकी उत्पत्ति को लेकर हजारों साल के खोज से आगे कोई विशेष खोज मिलियन डॉलर इन्वेस्टमेंट के बाद सामने आ ही जाए। लेकिन इतना जरूर है कि ज्ञान के आकाश को समझने के लिए कुछ ठोस आधार मानव जीवन को इस शोध के बाद मिल जाए। परंतु ज्ञान, दक्षता और सामान्य श्रम के बीच सदियों से चले आ रहे अंतरविरोध को न केवल सही अर्थ में समझना जरूरी हो गया है बल्कि इसे अतिशीघ्र खत्म करने की भी आवश्यकता है।

ज्ञान, दक्षता को प्रेरित करने की मंशा किसी भी संवेदनशील समाज की प्राथमिकता का विषय होना चाहिए, लेकिन एक संप्रभु देश के निर्माण के बाद कम से कम भारत में ज्ञान, श्रम और दक्षता के बीच जो व्यवहार रहा है वह अति अशोभनीय है। ज्ञान, दक्षता के नाम पर अति विशिष्ट संस्थानों का निर्माण हुआ। एक बेहद गरीब देश में करोड़ों झोंक दिए गए। तकनीकी और वैज्ञानिक संस्थानें तो कुछ हद तक और काफी वर्षों तक दक्षता के पैमाने पर अपने को कसता रहा लेकिन मानवीकी विज्ञान के संस्थान आज तक कोई भी मौलिक शोध प्रस्तुत करने में नाकाम रहा है जो मानव सभ्यता के लिए मील का पत्थर साबित हो।

हजारों साल के हमारे दर्शन, इतिहास, साहित्य ही इनके शोध के विषय वस्तु रहे। मानवीकी संस्थानें शायद ही इसमें कुछ नया जोर पाई। ज्ञान, दक्षता के नाम पर बनने वाले संस्थानों को अगर कालान्तर में रोजगार परक ही बनना था तो दक्षता और श्रम के विवाद को उठाना अत्यंत गैरजरूरी प्रतीत हो रहा है। हममें से ज्यादातर चिंतकों को 70 साल बाद के भारत का भ्रमण करना चाहिए। तब शायद आबादी के हालात को वो बेहतर तरीके से समझ पाएं। करोड़ों लोग मानव बम के रूप में आपको दिखाई देने लगेंगे। करोड़ों युवा दक्षता तो छोड़िए दो जून की रोजगार के लिए जो श्रम ज्ञान चाहिए उससे ही वंचित हैं, लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं हो सकता कि ज्ञान और दक्षता निर्माण की सारी गतिविधियों को रोक देना चाहिए। ये समझना जरूरी है कि इतनी बड़ी आबादी के लिए आखिर रास्ता क्या अख्तियार किया जाए?

हमारे यहां विश्वविद्यालय प्रमाण-पत्र प्रदान करने वाली एक एजेंसी बनकर रह गई है। और इसका मूल कारण ज्ञान और दक्षता के नाम पर सरकार प्रायोजित प्रतिष्ठानों का निर्माण रहा है। उन्हें ऐसे प्रतिष्ठानों का निर्माण जरूर करना चाहिए, लेकिन क्या ये संस्थानें करोड़ों युवाओं को समाहित कर सकती है? क्या सबको संपूर्ण ज्ञानी और दक्ष बनाया जा सकता है अगर नहीं तो उनके जीवन यापन का रास्ता क्या हो सकता है? अब जरा इस संदर्भ में मेक-इन-इंडिया के कॉन्सेप्ट को समझने का प्रयास कीजिए। मैं वर्षों से इस विवाद में उलझा हूं कि बिस्मिल्लाह खां और पंडित रविशंकर भारतीय प्रशासनिक सेवा में क्यों नहीं गए। संगीत के विभिन्न विधाओं के लिए भी प्रशासनिक और प्रबंधकीय आवश्यकता पड़ती है तो फिर इन संभागों का नेतृत्व किनके हाथों में होना चाहिए। अगर आप इस अंतर को समझ पाए तो मैं समझता हूं कि ज्ञान, दक्षता और श्रम इनके बीच कैसा सामंजस्य होना चाहिए इसे आप बेहतर तरीके से समझ पाएंगे।

श्रम और रोजगार को लेकर न सिर्फ भारत में बल्कि दुनिया भर में गृहयुद्ध जैसे हालात हैं। विशिष्ट को और विशिष्ट बनाने पर दुनिया भर की सरकारें दिल खोल कर काम कर रही हैं उन्हें ऐसा करने में एक फैशन का आभास भी होता है, लेकिन सामान्य के लिए किसी प्रकार की किसी संस्थागत ढांचे को बढ़ाने में वो संपूर्ण उदासीन हैं। ज्ञान, दक्ष और सामान्य के बीच में अगर ये खाई और बढ़ती रही तो मानव जाति एक दिन नख-बाल की लड़ाई लड़ेंगे वो समय दूर नहीं है। उम्मीद करता हूं चिंतक विशिष्ट के निर्माण के लिए जैसी चिंता व्यक्त करते हैं, सामान्य के लिए भी उनके ज्ञान चक्षु में कुछ न कुछ जगह होगी।
– वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष पाठक के फेसबुक वॉल से

