FCRA Amendment Bill 2026: विदेशी चंदे से संचालित गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), ट्रस्ट, शैक्षणिक संस्थानों और धार्मिक संगठनों को लेकर केंद्र सरकार संसद में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) में संशोधन का प्रस्ताव लेकर आई है। सरकार का कहना है कि इन बदलावों का उद्देश्य विदेशी फंड के उपयोग में पारदर्शिता बढ़ाना और संभावित अनियमितताओं पर रोक लगाना है। दूसरी ओर, विपक्ष और कई सामाजिक संगठनों ने इसे संस्थाओं की स्वायत्तता पर असर डालने वाला कदम बताया है। इस बीच अमेरिका के एक सांसद की टिप्पणी के बाद यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गया है।
संसद में पेश होगा संशोधन, बढ़ सकती है सियासी गर्मी
संसद के मानसून सत्र के तीसरे सप्ताह में सरकार FCRA संशोधन विधेयक पेश करने की तैयारी में है। माना जा रहा है कि यह विधेयक सदन में आते ही राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बन सकता है। सरकार का तर्क है कि विदेशी स्रोतों से मिलने वाले धन की निगरानी को और प्रभावी बनाने के लिए मौजूदा कानून में बदलाव आवश्यक हैं।
वहीं विपक्षी दलों और कई गैर-सरकारी संगठनों का कहना है कि प्रस्तावित प्रावधानों से स्वतंत्र रूप से काम करने वाली संस्थाओं पर अतिरिक्त प्रशासनिक नियंत्रण बढ़ सकता है।
प्रस्तावित संशोधन में क्या हो सकते हैं बदलाव?
- प्रस्तावित बिल में कई ऐसे प्रावधान शामिल किए गए हैं, जिनका सीधा संबंध विदेशी फंड प्राप्त करने वाली संस्थाओं के संचालन और जवाबदेही से है।
- यदि किसी संस्था का FCRA लाइसेंस रद्द होता है, उसका नवीनीकरण नहीं होता या संस्था स्वयं लाइसेंस छोड़ देती है, तो उसकी विदेशी फंड से जुड़ी संपत्तियों और बैंक खातों के प्रबंधन के लिए एक नामित प्राधिकरण नियुक्त किया जा सकता है।
- सरकार को ऐसी संपत्तियों के प्रबंधन, हस्तांतरण या निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत निपटान से जुड़े अधिकार दिए जाने का प्रस्ताव है।
- विदेशी अनुदान के उपयोग और रखरखाव के लिए समय-सीमा तय करने तथा जांच के दौरान संबंधित संपत्तियों के हस्तांतरण पर रोक लगाने जैसे प्रावधान भी प्रस्तावित हैं।
- नियमों के उल्लंघन की स्थिति में केवल संस्था ही नहीं, बल्कि उसके ट्रस्टी, निदेशक और प्रमुख पदाधिकारी भी जवाबदेह हो सकते हैं।
- साथ ही यह भी प्रस्तावित है कि FCRA से जुड़े मामलों में जांच एजेंसियां केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति के बाद ही औपचारिक कार्रवाई शुरू कर सकें।
सरकार का पक्ष
केंद्र सरकार का कहना है कि इन संशोधनों का उद्देश्य किसी संस्था की गतिविधियों पर रोक लगाना नहीं, बल्कि विदेशी फंडिंग व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है। सरकार का दावा है कि इससे फंड के दुरुपयोग की आशंकाएं कम होंगी और नियामकीय प्रक्रिया अधिक मजबूत होगी।
विपक्ष और सामाजिक संगठनों की आपत्ति
दूसरी ओर, कई विपक्षी दल और नागरिक समाज से जुड़े संगठन मानते हैं कि प्रस्तावित बदलावों से गैर-सरकारी संस्थाओं की स्वतंत्र कार्यशैली प्रभावित हो सकती है। उनका कहना है कि यदि निगरानी और नियंत्रण का दायरा अत्यधिक बढ़ता है, तो सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं के लिए काम करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
अमेरिकी सांसद की टिप्पणी से बढ़ी चर्चा
इस बीच अमेरिका के रिपब्लिकन सांसद राइली मूर ने प्रस्तावित संशोधन पर सार्वजनिक रूप से चिंता जताई है। उन्होंने सोशल मीडिया मंच X पर कहा कि भारत में ईसाई समुदाय का इतिहास काफी पुराना है और यदि प्रस्तावित कानून वर्तमान स्वरूप में लागू होता है तो इससे चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं पर असर पड़ सकता है।
मूर ने यह भी कहा कि उनके अनुसार यह कदम ईसाई समुदाय के लिए चिंता का विषय है और यदि विधेयक इसी रूप में आगे बढ़ता है तो इसका असर भारत-अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों पर भी चर्चा का कारण बन सकता है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह मामला?
FCRA कानून लंबे समय से विदेशी फंड प्राप्त करने वाली संस्थाओं को नियंत्रित करने वाला प्रमुख कानूनी ढांचा रहा है। प्रस्तावित संशोधन पारित होने की स्थिति में विदेशी अनुदान प्राप्त करने वाले संगठनों के संचालन, वित्तीय जवाबदेही और नियामकीय निगरानी में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
अब सबकी नजर संसद की कार्यवाही पर है। यदि विधेयक पारित होता है, तो उसके अंतिम नियम और लागू होने की प्रक्रिया सरकार की अधिसूचना के बाद स्पष्ट होगी। साथ ही यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि घरेलू राजनीतिक बहस और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं के बीच सरकार इस कानून को किस रूप में आगे बढ़ाती है।

