चाबहार पोर्ट पर अमेरिकी हमला सिर्फ ईरान की खबर नहीं,भारत के लिए रणनीतिक’ अलर्ट

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अमेरिका-ईरान तनाव के बीच चाबहार पोर्ट पर हमले की खबर ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। हालांकि भारत ने स्पष्ट किया है कि उसके संचालन वाला शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल सुरक्षित है।असल में चाबहार भारत के लिए इसलिए अहम है क्योंकि इसके जरिए पाकिस्तान को बायपास कर अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक व्यापार और रणनीतिक पहुंच बनाई जाती है।

यूएस और ईरान के बीच जंग दोबारा से भड़क उठी है। अपने मनमुताबिक समझौते के लिए राजी न होने पर ट्रंप ने अमेरिकी सेना को ईरान को मिट्टी में मिलाने का आदेश दे दिया है। यूएस मिलिट्री पिछले 7 दिनों से रोजाना रात को ईरान के अलग-अलग शहरों में भारी बमबारी कर रही है।उसके निशाने पर ईरान के पोर्ट, बिजली संयत्र, पुल, सड़कें समेत बुनियादी ढांचे हैं।ऐसा करके वह ईरान को पूरी तरह पंगु कर देना चाहता है। अमेरिकी सेना ने चाबहार बंदरगाह पर बने वॉच टावर को भी मिसाइल मारकर उड़ा दिया।इस घटना के बाद से भारत में भी चिंता बढ़ गई है। इसकी वजह यह है कि यह बंदरगाह भारत के सहयोग से विकसित किया जा रहा है। जिसके निर्माण पर भारत 40 अरब डॉलर खर्च कर चुका है।

रिपोर्ट के मुताबिक, शुक्रवार को अमेरिका की ओर से किए गए हमले में ईरान के दक्षिणी तट पर स्थित चाबहार पोर्ट का एक ट्रैफिक-कंट्रोल और निगरानी टावर ढह गया।हालांकि, भारत के विदेश मंत्रालय ने साफ किया है कि भारत द्वारा संचालित ‘शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल’ सुरक्षित है और उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचा है। इसके बावजूद, यह हमला नई दिल्ली के लिए बड़ा रणनीतिक ‘वेक-अप कॉल’ माना जा रहा है। पश्चिम एशिया की यह अशांति अब सीधे भारत के आर्थिक और कूटनीतिक हितों की चौखट तक पहुंच चुकी है।

चाबहार बंदरगाह को भारत ने ओमान की खाड़ी में पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के जवाब में तैयार किया है।ग्वादर पोर्ट को चीन विकसित कर रहा है।ऐसे में उसके बगल में चाबहार पोर्ट बनाकर भारत सेंट्रल एशिया तक सीधी पहुंच बनाना चाहता है।इस रूट के जरिए वह पाकिस्तान की धरती का इस्तेमाल किए बिना सीधे अफगानिस्तान, मध्य एशिया और रूस तक व्यापारिक पहुंच तैयार कर रहा है। जिसे भारत ने इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर यानी INSTC का नाम दिया है।यह रूट भारत को मध्य एशिया के विशाल बाजारों से जोड़ने का सबसे छोटा और सुरक्षित रास्ता माना जाता रहा है।

इस व्यापारिक मार्ग का सबसे अहम बिंदु चाबहार पोर्ट है, जो ईरान के दक्षिण में हैं। इस पोर्ट पर माल उतारकर उसे ईरान के सड़क और रेल मार्ग के जरिए सेंट्रल एशिया और यूरोप के विभिन्न देशों तक भेजा जाता है।चूंकि भारत अपने तैयार माल को खपाने के लिए नए बाजार ढूंढ रहा है।इसलिए वह इस पोर्ट को विकसित करने में जुटा है।उसने हाल ही में चाबहार के विकास के लिए 120 मिलियन डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता भी जताई। भारत इस प्रोजेक्ट को अपनी फॉरेन पॉलिसी का एक बड़ा पिलर मानता है।हालांकि, अमेरिकी प्रतिबंधों के साये और हालिया तनाव के चलते भारत ने इस साल के बजट में इसके लिए नई फंडिंग जारी नहीं की थी।

चाहबहार पोर्ट पर हमला भारत के लिए ‘रणनीतिक अलर्ट’ माना जा रहा है।इसकी वजह यह है कि यह बंदरगाह होर्मुज स्ट्रेट के बाहर स्थित है, इसलिए अब तक यह माना जा रहा था कि यह खाड़ी के किसी भी प्रत्यक्ष युद्ध या तनाव से सुरक्षित रहेगा।लेकिन अमेरिकी सेंट्रल कमांड द्वारा चाबहार के ‘शाहिद कलंतरी टर्मिनल’ के टावर को निशाना बनाए जाने के बाद यह भ्रम पूरी तरह टूट गया है। इससे यह साबित हो गया है कि युद्ध की स्थिति में भारत का ड्रीम प्रोजेक्ट भी सीधे तौर पर जंग के दायरे में आ गया है।

डिफेंस एक्सपर्टों के मुताबिक, अगर अमेरिका और ईरान के बीच पूर्ण युद्ध भड़क जाता है तो भारत के लिए इस पोर्ट को सुचारू रूप से संचालित करना, जहाजों का बीमा कराना और बैंकिंग लेनदेन को जारी रखना बेहद मुश्किल हो जाएगा। ऐसे में उसका भारत का मध्य एशिया और यूरेशिया से जुड़ने का सपना अधर में लटक जाएगा। इस रूट के ठप होने से भारतीय निर्यातकों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा और सप्लाई चेन पूरी तरह प्रभावित होगी।

भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि वह सुरक्षा कारणों या अमेरिकी दबाव में आकर ईरान में अपने परिचालन को धीमा या पूरी तरह बंद करता है, तो इस खाली जगह को भरने के लिए चीन तुरंत तैयार बैठा है।चीन पहले से ही पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट को संभाल रहा है और ईरान के साथ उसकी 25 साल की रणनीतिक साझेदारी है।चाबहार से भारत के कदम पीछे खींचने का सीधा मतलब होगा इस पूरे क्षेत्र की कमान चीन के हाथों में सौंप देना, जो भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता है।

दूसरी ओर, भारत के अमेरिका के साथ गहरे रणनीतिक, तकनीकी और व्यापारिक संबंध हैं। क्वाड जैसे मंचों पर भारत और अमेरिका साथ हैं।ऐसे में भारत न तो अमेरिका को नाराज कर सकता है और न ही ईरान में अपने रणनीतिक हितों को छोड़ सकता है। यह स्थिति भारतीय कूटनीति के लिए ‘दोधारी तलवार’ पर चलने जैसी है.

अब भारत के सामने संकट यह है कि वह इस परेशानी से खुद को बाहर कैसे निकाले। भारतीय रणनीतिकारों को यह भी समझ आ रहा है कि उन्हें अपनी कनेक्टिविटी के लिए केवल एक ही विकल्प पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहिए।इसके लिए उसे इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) के अन्य वैकल्पिक रास्तों पर भी काम तेज करना होगा।साथ ही, खाड़ी देशों के साथ मिलकर ओमान या यूएई के जरिए नए रूट तलाशने होंगे।हालांकि, ये सब दीर्घ अवधि के काम हैं, जिसमें काफी समय और खर्च हो सकता है। लिहाजा इसे फिलहाल यूएस के साथ बातचीत करके चाबहार में बमबारी रुकवाने पर ध्यान देना होगा,जिससे वहां पर उसके हित सुरक्षित रह सकें।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि आज की वैश्विक राजनीति में कोई भी निवेश पूरी तरह सुरक्षित नहीं है जब तक कि आपके पास मजबूत रणनीतिक बैकअप न हो।चाबहार में भारत का टर्मिनल भले ही सुरक्षित है, लेकिन युद्ध क्षेत्र के मुहाने पर खड़े किसी भी प्रोजेक्ट में निवेश और व्यापार को सुरक्षित रख पाना भारत के लिए आने वाले समय में काफी मुश्किल हो सकता है।ऐसे में यह संघर्ष भारत के लिए अग्निपरीक्षा जैसी कूटनीतिक चुनौती साबित होने जा रहा है।

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