राजनीति तो नीति ही है राज की, और उसे पर भी अगर बात सत्ता धारी दल के नीति की करें तो इसके तो खेल ही निराले हैं। नोट फॉर वोट का खेल तो संसद के पटल तक पर हुआ है। अभी सत्ताधारी दल भाजपा पर विपक्ष ईडी सीबीआई इनकम टैक्स आदि के द्वारा विपक्ष को बर्बाद करने का खेल खेलने का आरोप लगाते हैं।
टीएमसी के 80 में से 60 विधायक और उसके 20 विधायक बागी हो गए, टीएमसी के सट्टा कमाने के साथी उसका साथ छोड़ने वाले उसके पार्टी के सिर्फ संसद और विधायक ही नहीं थे बल्कि ब्लॉक और पंचायत स्तर तक के सदस्यों ने भी ममता बनर्जी के प्रति बागी रुक बना लिया है।आज भी पूर्व मंत्री चंद्रमा भट्टाचार्य ने टीएमसी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया है।
कुछ इसी तरह की बात महाराष्ट्र में शिवसेना यूबीटी के सांसदों को लेकर भी देखी गई। शिवसेना यूबीटी के 9 सांसदों में से 6 सांसदों ने शिवसेना यूबीटी को छोड़कर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना का दामन थाम लिया।
विपक्षी राजनीतिक दल के नेता इन सभी गतिविधियों के लिए पीएम मोदी और अमित शाह को दोषी मानते हैं। इनका मानना है की पीएम मोदी और अमित शाह संसद में नारी शक्ति वंदन अधिनियम और परिसीमन बिल को संसद से पारित करवाने में मिली सफलता के मध्य नजर अपने सांसदों की संख्या को 360 तक करने के लिए अपने अधीन सीबीआई, ईडी,इनकम टैक्स आदि एजेंसियों का दुरुपयोग करने में जुट गई है।
विपक्षी राजनीतिक दल अपने इन आप को लेकर किसी प्रकार का कोई प्रमाण नहीं दे पाए हैं, लेकिन हमारे देश की पूर्ववर्ती सरकार के कई ऐसे कारनामे हुए हैं जो प्रमाणित भी हुए जनता ने भी जिसे देख भारत की जनता ने बल्कि दुनिया भर के लोगों ने भी इसे समाचार माध्यमों के जरिए देखा।
जुलाई 1993 में, तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव की अल्पसंख्यक कांग्रेस सरकार संसद में एक अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion) का सामना कर रही थी। सरकार को गिराने से बचाने के लिए, शिबू सोरेन सहित झामुमो (JMM) के चार सांसदों ने कथित तौर पर कांग्रेस से मोटी रिश्वत (नोटों से भरे बैग) लेकर सरकार के पक्ष में वोट दिया था। इसके बाद नरसिम्हा राव की सरकार सदन में बहुमत साबित कर बचाने में सफल रही।
इस लेन-देन की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा की गई थी और जांच में सांसदों को रिश्वत मिलने की बात सामने आई थी।
यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। वर्ष 1998 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने 3:2 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए इन सांसदों को भ्रष्टाचार के आरोप से यह कहते हुए बरी कर दिया था कि संविधान के अनुच्छेद 105(2) के तहत सांसदों को संसद में उनके भाषण या वोट देने के बदले कानूनी कार्रवाई से छूट प्राप्त है।
बाद में मार्च 2024 में, सुप्रीम कोर्ट की 7-सदस्यीय संविधान पीठ ने इस ऐतिहासिक निर्णय को पलट दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सांसदों या विधायकों को रिश्वत लेने और उसके बदले सदन में वोट देने या भाषण देने के मामले में कोई कानूनी उन्मुक्ति प्राप्त नहीं होगी और उन पर मुकदमा चलाया जा सकता है।
इसी तरह का एक अन्य मामला मनमोहन सिंह की सरकार के वक्त में भी आया था।22 जुलाई 2008 को लोकसभा में विश्वास मत के दौरान भारतीय जनता पार्टी (BJP) के तीन सांसदों—फग्गन सिंह कुलस्ते, अशोक अर्गल और महावीर भगोरा ने नोटों की गड्डियां लहराई थीं।इन तीनों सांसदों ने आरोप लगाया था कि मनमोहन सिंह की तत्कालीन यूपीए सरकार को बचाने (विश्वास मत के समर्थन या अनुपस्थिति) के लिए उन्हें रिश्वत के तौर पर 1 करोड़ रुपये दिए गए थे। इस घटना को भारतीय संसदीय इतिहास में कैश फॉर वोट के नाम से जाना जाता है।
तब इस तरह की चर्चा चली थी की बिन सेवन हिंदी और सीएनएन आईबीएन अंग्रेजी के रिपोर्टर ने इस घटना को लेकर एक स्टिंग ऑपरेशन किया था। यह स्टिंग ऑपरेशन तब काफी चर्चित हुआ था, क्योंकि इस स्ट्रिंग ऑपरेशन के होने के सबूत बीजेपी और कई अन्य राजनीतिक दल के नेताओं को दिखाया गया था।बीजेपी के नेता अरुण जेटली बार-बार इस मीडिया हाउस से इस स्टिंग ऑपरेशन को प्रसारित करने का आग्रह कर रहे थे, लेकिन इस बीच इसे लेकर अंदर ही अंदर एक बड़ा खेला हो गया और वह स्टिंग ऑपरेशन कभी सामने नहीं आया। कहा जाता है की उस मीडिया हाउस के मैनेजिंग एडिटर राजदीप सर देसाई को इस स्टिंग ऑपरेशन को प्रसारित न करने के पुरस्कार स्वरूप पद्मश्री से सम्मानित किया गया। तब ऐसा माना जा रहा था कि उस स्टिंग के सामने आने पर मनमोहन सिंह की सरकार जिनके ऊपर अपनी अल्पमत की सरकार को बचाने के लिए पैसे बांटने का स्टिंग हुआ था, उनकी सरकार गिर सकती थी।

