टेलीग्राम ब्लॉक असंभव’, CBSE वेबसाइट की पोल खोलने वाले निसर्ग का दावा,

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पेपर लीक के बाद NEET 2026 की दोबारा होने वाली परीक्षा को देखते हुए भारत सरकार ने Telegram ऐप पर अस्थाई बैन जरूर लगा दिया है लेकिन सरकार के लगाए बैन को लोग चुनौती देते दिख रहे हैं। दरअसल X पर यूजर्स बैन के बावजूद Telegram टेलीग्राम एक्सेस करने के अपने-अपने पैंतरे दिखा रहे हैं। कोई इसके लिए VPN इस्तेमाल कर रहा है, तो कोई प्रॉक्सी सर्वर के जरिए बड़े आराम से Telegram चलाकर रहा है। ऐसे में सवाल उठने लाजमी हैं कि जब आम लोग बैन के बाद भी Telegram को इतनी आसानी से एक्सेस कर पा रहे हैं, तो पेपर लीक करने वाले कैसे नहीं कर पाएंगे?

गौर करने वाली बात है कि CBSE साइट की पोल खोलने वाले 19 साल के साइबर सुरक्षा रिसर्चर निसर्ग अधिकारी का भी दावा है कि Telegram ऐप को बनाया इस तरह से गया है कि इस पर पूरी तरह से बैन संभव नहीं है।

X पर कई यूजर्स बैन के बाद भी Telegram चलाकर दिखा रहे हैं। @Singlejivi नाम के यूजर X पर VPN के जरिए Telegram को चलाकर दिखा रहे हैं कि कैसे बिना VPN के टेलीग्राम पर उन्हें सिर्फ कनेक्टिंग दिखाई दे रहा था और VPN ऑन करते ही उनका टेलीग्राम तुरंत काम करने लगता है।

इसी तरह @deepugami नाम के अकाउंट पर यूजर MTPROTO proxy के जरिए Telegram एक्सेस करने का तरीका बताता दिखा। ये ऐसे तरीके हैं, जो Telegram पर लगे सरकार के बैन को बायपास कर सकते हैं। इस बारे में CBSE की कमियों को उजागर करने वाले 19 साल के साइबर सुरक्षा रिसर्चर निसर्ग अधिकारी का भी दावा है कि ‘Telegram ऐप को बैन करना असंभव है।’
इस बारे में उन्होंने X पर लिखा कि टेलीग्राम को सेंसरशिप दिमाग में रखकर बनाया गया है। दरअसल, Telegram अपने यूजर्स को आसानी से प्रॉक्सी और बाईपास करने के तरीके इस्तेमाल करने की छूट देता है। इस वजह से इसे पूरी तरह ब्लॉक करना मुश्किल हो जाता है।

दरअसल भारत में किसी ऐप या वेबसाइट को ब्लॉक करने की जिम्मेदारी इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर की होती है।
जब सरकार किसी ऐप या वेबसाइट पर बैन लगाती हैं, तो जियो और एयरटेल जैसे इंटरनेट
सर्विस प्रोवाइडर्स के DNS सिस्टम उस ऐप या साइट के सर्वर का पता ढूंढने से मना कर देते हैं।
DNS को आप इंटरनेट की एड्रेसबुक की तरह समझ सकते हैं। ऐसे में यूजर बैन हुई साइट या ऐप को सर्च करता है, तो DNS सिस्टम यूजर को वह पता नहीं बताता और यूजर साइट या ऐप को एक्सेस नहीं कर पाता।

एक आम ऐप या साइट के मुकाबले Telegram को ब्लॉक करना मुश्किल है क्योंकि टेलीग्राम डायरेक्ट DNS लुकअप नहीं करता। जिसकी वजह से इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स का DNS सिस्टम इस ऐप पर काम नहीं करता।
Telegram अपनी रिक्वेस्ट पूरी तरह एन्क्रिप्ट करके गूगल और क्लाउडफ्लेयर जैसे बड़े क्लाउड सर्वर्स पर भेजता है। इससे भी ISPs को पता नहीं चल पाता कि यूजर टेलीग्राम खोलने की कोशिश कर रहा है।
Telegram MTProto एन्क्रिप्शन प्रोटोकॉल टेक्नोलॉजी पर बना है। यह तकनीक इसके डिजिटल सिग्नेचर को इस तरह बदल देती है कि इसका ट्रैफिक किसी साधारण साइट की तरह दिखने लगता है। इस वजह से टेलीकॉम कंपनियों के एडवांस टूल्स टेलीग्राम को अलग से पहचान नहीं पाते। MTProto प्रॉक्सी और बाईपास करने के फीचर्स होने की वजह से ही यूजर्स बैन के बाद भी इसे चलाने के दावे करते दिख रहे हैं।

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