भूपेंद्र यादव के घर बैठक में कुछ ऐसा हुआ कि बागी सांसदों ने TMC पर नहीं ठोका दावा

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पश्चिम बंगाल की चुनावी हार के डेढ़ महीने के अंदर तृणमूल कांग्रेस ताश के पत्तों की तरह बिखर गई। पार्टी के 20 सांसद तृणमूल से अलग हो गए हैं।बागी सांसद नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) के साथ मर्ज हो गए हैं।इससे पहले बागी सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात की थी और उन्हें एक पत्र सौंपा था, जिसमें उन्होंने संसद में बैठने के लिए अलग से जगह देने की मांग की थी।

वैसे तो ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस में बगावत चुनाव नतीजे आने के कुछ दिन बाद से ही शुरू हो गई थी।सबसे पहले तृणमूल के 60 से ज्यादा विधायकों ने बगावत की. बाद में लोकसभा सांसदों ने बगावत कर दी।राज्यसभा के भी तीन सांसद इस्तीफा दे चुके हैं।

तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों ने अब एनडीए को समर्थन देने का ऐलान किया है। लेकिन हैरान करने वाला फैसला NCPI के साथ मर्जर का रहा। शुरुआत से ही बागी सांसद खुद को ‘असली टीएमसी’ बता रहे थे लेकिन रविवार को बीजेपी नेता और केंद्रीय भूपेंद्र यादव के घर बैठक और फिर ओम बिरला से मुलाकात के बाद उन्होंने NCPI के साथ विलय की घोषणा कर दी।

बागी सांसद शुरुआत से ही भूपेंद्र यादव के संपर्क में बने हुए हैं। पहली बार जब बागियों ने मुलाकात की थी, तो वह भी भूपेंद्र यादव के घर ही हुई थी, जिसमें पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी थे।

रविवार को भी टीएमसी के बागी सांसदों ने पहले भूपेंद्र यादव के घर पर बैठक की। सूत्रों ने बताया कि इस बैठक के दौरान बागी सांसदों का एक गुट टीएमसी से पूरी तरह अलग होना चाहता था। वे चाहते थे कि बागी नेता पार्टी का नाम, चुनाव चिह्न और राजनीतिक पहचान समेत सब कुछ छोड़ दें। इनमें सयानी घोष, जून मालिया और मिताली बाग जैसे युवा सांसद थे।
वहीं, बागियों की दूसरे गुट की राय थी कि टीएमसी की विरासत पर अपना दावा बनाए रखा जाए। उनका तर्क था कि बागी गुट को पार्टी के असली उत्तराधिकारी के तौर पर मान्यता हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए।
सूत्रों का कहना है कि भूपेंद्र यादव पर हुई बैठक में इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हुई, क्योंकि सांसदों ने अपनी भविष्य की राजनीतिक रणनीति पर भी विचार किया।

बागी सांसदों ने एक ऐसी पार्टी के साथ विलय करने का फैसला लिया है, जो सियासी हलकों में अब तक अनजान थी।NCPI ने त्रिपुरा के 2023 के विधानसभा चुनाव में दो उम्मीदवार उतारे थे और दोनों की ही जमानत जब्त हो गई थी।

NCPI के मर्जर के फैसले की एक वजह राजनीतिक जानकार तृणमूल कांग्रेस के संविधान को मानते हैं।एक राजनीतिक जानकार ने कहा कि पार्टी के भीतर फैसले लेने वाली सर्वोच्च संस्था पहले स्टेट एग्जीक्यूटिव कमेटी थी, लेकिन संशोधन के बाद नेशनल एग्जीक्यूटिव कमेटी को यह दर्जा दिया गया।पार्टी के संविधान के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस में संगठन के अधिकारियों का प्रभाव सांसदों और विधायकों की तुलना में कहीं ज्यादा माना जाता है।
यह कमेटी काफी हद तक ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के इर्द-गिर्द मानी जाती है, इसलिए बागियों के लिए पार्टी का चुनाव चिह्न और पार्टी फंड पर नियंत्रण हासिल करना मुश्किल होता।
वहीं, सीपीएम के राज्यसभा सांसद विकास रंजन भट्टाचार्य का मानना है कि इस पूरी योजना के पीछे बीजेपी का हाथ है। उन्होंने कहा कि भूपेंद्र यादव के घर पर बागी सांसदों की कई बैठकों से यही संकेत मिलता है।
उन्होंने कहा कि बीजेपी का मुख्य उद्देश्य संसद में अहम बिलों को पास कराने के लिए बागी सांसदों का समर्थन हासिल करना है।इसलिए पार्टी ने कोई जोखिम नहीं उठाया और लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस की संसदीय पार्टी पर कब्जा करने की कोशिश करने की बजाय बागी सांसदों को किसी नई पार्टी में शामिल कराने की रणनीति बनाई।’

कुछ समय पहले तक, बहुत कम लोग NCPI के बारे में जानते थे। लेकिन आज, हर कोई इस पार्टी की चर्चा कर रहा है।पार्टी के प्रेसिडेंट, उत्तिया कुंडू, नादिया जिले के रानाघाट के एक आम परिवार से आते हैं।उन्होंने गणित में ऑनर्स की डिग्री पूरी की और बाद में डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की।प्राइवेट ट्यूशन पढ़ाने के साथ-साथ, वे पढ़ाई और लेखन में भी गहराई से जुड़े रहे।

उनके पिता, प्रणब कुंडू, रानाघाट नगरपालिका में एक सीनियर कर्मचारी थे।पिता की मौत के कुछ साल बाद, उत्तिया कुंडू ने रानाघाट छोड़ दिया और अभी हावड़ा जिले के मौरी गांव में रहते हैं। वे वहां एक लॉ फर्म से जुड़े हैं, जहां वे अपना ज्यादातर समय बिताते हैं।
NCPI के अचानक चर्चा में आने से राष्ट्रीय स्तर पर लोगों का ध्यान इसकी ओर गया है। यह तब हुआ जब ऐसी खबरें आईं कि तृणमूल के लगभग 20 बागी सांसदों ने इस पार्टी में विलय कर लिया है और NDA को अपना समर्थन दिया है।

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