Bihar News: बिहार की समृद्ध लोक कला परंपरा को नई पहचान देने के उद्देश्य से पटना स्थित Bihar Museum में “संवाद: टिकुली कला – कलाकारों की नजर में” कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस खास आयोजन में राज्य के नामचीन कलाकारों ने भाग लेकर टिकुली कला की विरासत, बदलाव और भविष्य पर विस्तार से चर्चा की।
800 साल पुरानी परंपरा, आज भी जिंदा है टिकुली कला
कार्यक्रम में कलाकारों ने बताया कि Tikuli Art बिहार की बेहद प्राचीन लोक कला है, जिसकी शुरुआत करीब 800 वर्ष पहले मानी जाती है। “टिकुली” शब्द संस्कृत के “टिका” से निकला है, जिसका अर्थ माथे पर सजने वाली बिंदी होता है। शुरुआती दौर में यह कला कांच पर सोने की पॉलिश और बारीक चित्रकारी के रूप में विकसित हुई थी।
बदलते समय के साथ बदला रूप, बढ़ा विस्तार
समय के साथ इस कला में बड़े बदलाव आए हैं। महंगे कांच और सोने की जगह अब लकड़ी, हार्डबोर्ड और एनामेल रंगों का उपयोग किया जा रहा है। आज टिकुली कला केवल बिंदी तक सीमित नहीं रही, बल्कि ट्रे, कोस्टर, ज्वेलरी बॉक्स, दीवार सजावट और कपड़ों तक इसका विस्तार हो चुका है।
Padma Shri कलाकार ने सुनाया सुनहरा इतिहास
कार्यक्रम में शामिल Ashok Kumar Biswas ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि 1973 में उपेंद्र महारथी संस्थान से जुड़े और टिकुली पेंटिंग के जरिए अपनी पहचान बनाई। उन्होंने यह भी बताया कि 1982 में नई दिल्ली में आयोजित एशियन गेम्स के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री Indira Gandhi के हाथों हजारों खिलाड़ियों को टिकुली पेंटिंग भेंट की गई थी, जो इस कला के गौरव का प्रतीक है।
फैशन और आर्ट का अनोखा संगम
टिकुली कलाकार रुचि कुमारी ने बताया कि अब इस कला को कपड़ों पर भी उतारा जा रहा है। खासकर भागलपुर की तसर सिल्क साड़ियों और धोती-गमछा पर टिकुली पेंटिंग का काम इसे और खास बना रहा है। यह पारंपरिक कला अब मॉडर्न फैशन का हिस्सा बनती जा रही है।
नई पीढ़ी भी सीख रही कला, बढ़ रहा दायरा
कलाकार मनीषा कुमारी ने बताया कि टिकुली कला में लगातार नए प्रयोग हो रहे हैं। उन्होंने राम दरबार की पेंटिंग जैसे धार्मिक विषयों पर भी काम किया है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में कला प्रेमियों और छात्रों ने हिस्सा लिया, जिससे इस पारंपरिक कला के प्रति बढ़ती रुचि साफ नजर आई।

