ट्रंप-मोदी फोन कॉल में कैसे घुसे मस्क,इसे क्यों छिपा रहे पीएम मोदी

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच ईरान युद्ध और होर्मुज की स्थिति पर हुई फोन कॉल में दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति और टेस्ला- स्पेसएक्स के मालिक एलन मस्क भी शामिल हुए। यह घटना एक निजी नागरिक के रूप में दो देशों के राष्ट्राध्यक्षों के बीच युद्धकालीन चर्चा में शामिल होने का अनोखा मामला माना जा रहा है।

न्यूयॉर्क टाइम्स ने शुक्रवार को रिपोर्ट किया था कि मंगलवार (24 मार्च 2026) को हुई इस कॉल में मस्क की मौजूदगी दो अमेरिकी अधिकारियों ने गुमनाम रूप से पुष्टि की। ये अधिकारी सार्वजनिक रूप से टिप्पणी करने के लिए अधिकृत नहीं थे। हालांकि, व्हाइट हाउस और भारतीय विदेश मंत्रालय की आधिकारिक रीडआउट मैं एलन मस्क का जिक्र नहीं किया गया है।

ट्रंप ने मोदी से ईरान के साथ बढ़ते संकट पर बात की, खासकर ईरानी सेना द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण के मुद्दे पर। प्रधानमंत्री मोदी ने एक्स पर लिखा कि दोनों नेताओं ने डी-एस्केलेशन (तनाव कम करने), शांति प्रयासों और जलडमरूमध्य को “खुला, सुरक्षित और सुलभ” रखने पर सहमति जताई। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलाइन लीविट ने भी इसे “अच्छी बातचीत” बताया और कहा कि ट्रंप का मोदी के साथ “बहुत अच्छा संबंध” है। व्हाइट हाउस की प्रवक्ता या मोदी ने अपने ट्वीट में एलोन मस्क का कहीं भी जिक्र नहीं किया।

रिपोर्ट के अनुसार यह स्पष्ट नहीं है कि मस्क ने कॉल के दौरान कुछ बोला या नहीं, और न ही यह पता चला कि उन्हें क्यों शामिल किया गया। मस्क वर्तमान में कोई सरकारी पद पर नहीं हैं। उन्होंने 2025 में ट्रंप प्रशासन में डिपार्टमेंट ऑफ गवर्नमेंट एफिशिएंसी (DOGE) का नेतृत्व किया था, लेकिन बाद में इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद दोनों के बीच सार्वजनिक मतभेद भी हुए थे, जो अब सुलझते दिख रहे हैं।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई फोन कॉल के बीच एक उद्योगपति एलोन मस्क का शामिल होना हालांकि कानूनी रूप से संभव है लेकिन उसे औपचारिक अथॉरिटी नहीं माना जाएगा। किसी भी देश का प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति अपनी मर्ज़ी से किसी भी व्यक्ति को कॉल में शामिल कर सकता है। यह सब सलाहकारों और तकनीकी विशेषज्ञों के बारे में सही लगता है। लेकिन उद्योगपतियों को शामिल करने की परंपरा बहुत धूमिल रही है। इसलिए यह अवैध तो नहीं है लेकिन इसमें प्रोटोकॉल तोड़ा गया और यह अपरंपरागत है।

कारोबारी के रूप में एलोन मस्क की हैसियत बहुत बड़ी है। लेकिन किसी भी तरह का सरकार पद नहीं होने के कारण उनका लोकस स्टैंडी शून्य है। न तो वो अमेरिका में अब कोई सरकारी अधिकारी हैं और न ही भारत में उनके पास कोई पद है। लेकिन मस्क के अनौपचारिक पावर है, जिसे उन्होंने सूचना प्रौद्योगिकी के दम से हासिल किया है। यही चीज़ उन्हें दो राष्ट्रध्यक्षों के बीच खड़ा करती है। युद्ध के दौरान मस्क के स्टारलिंक ने ईरान में विरोधियों की मदद की।

इस समय पूरी दुनिया में टेक डिप्लोमेसी संबंधों को बनाने-बिगाड़ने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। आज युद्ध सिर्फ सेना से नहीं लड़े जाते। इसमें आपको सैटेलाइट कम्युनिकेशन, साइबर वॉरफेयर और इंटरनेट को नियंत्रित करना पड़ता है। मस्क के पास स्टारलिंक जैसा इंटरनेट सिस्टम है। जिसने अपनी उपयोगिता यूक्रेन-रूस युद्ध में साबित की। मस्क अब स्टैटजिक एसेट होल्डर की भूमिका निभा रहे हैं।शायद इसीलिए उन्हें बातचीत में लिया गया।

अगर प्राइवेट व्यक्ति युद्ध संबंधी बातचीत में बैठ रहा है तो सवाल उठते हैं: क्या कॉरपोरेट हित राष्ट्रीय हित पर हावी नहीं हो रहे हैं?
क्या इससे संबंधित देशों की नीतियां प्रभावित नहीं होंगी। इसलिए इसे विदेशी नीति का निजीकरण कहने में कोई बुराई नहीं है। मस्क के फीडबैक से भारत की विदेश नीति को एक दिशा भी मिल सकती है।ऐसे में पीएम मोदी मस्क की बातों पर गौर नहीं फरमाएंगे, यह असंभव है। मस्क ने ट्रंप को राष्ट्रपति चुनाव में जबरदस्त फंडिंग की थी। एलोन मस्क ने 2024 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप को समर्थन देने के लिए करीब 250 मिलियन से 290 मिलियन डॉलर (लगभग 2,100 करोड़ से 2,400 करोड़ रुपये) का फंड दिया था। ट्रंप सत्ता में आए तो उन्होंने बहुत सारी चीजें मस्क के कहने पर कीं। बीच में ट्रंप और मस्क के रिश्ते खराब हुए थे लेकिन अब फिर से संबंध सुधरने की खबरें हैं।

यह घटना तीन चीज़ें दिखाती है: पावर शिफ्ट- अब ताकत सिर्फ सरकारों के पास नहीं है। बड़ी टेक कंपनियां भी ग्लोबल पावर सेंटर बन चुकी हैं। अनौपचारिक डिप्लोमेसी का उदय हो चुका है। यह आधिकारिक डिप्लोमेसी के साथ साथ चल रही है। इसे शैडो या बैकचैनल डिप्लोमेसी भी कह सकते हैं। लेकिन तीसरा प्वाइंट ये है कि इसमें लोकतंत्र के लिए तमाम जोखिम छिपे हैं। क्योंकि सरकार में निजी क्षेत्र का प्रभाव बढ़ने से पारदर्शिता कम होती चली जाती है। सरकार को निजी क्षेत्र के हिसाब से फैसले लेने पर मजबूर होना पड़ता है।
पीएम मोदी और डोनाल्ड ट्रंप के बीच में बातचीत के बीच एलन मस्क के शामिल होने के मामले को कांग्रेस ने गंभीरता से लेते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कटघरे में खड़करते हुए कई प्रश्न पूछे हैं।कांग्रेस ने पूछा है कि क्या यह सचमुच पश्चिम एशिया संकट के बारे में था, या इसके पीछे कोई और ‘बिजनेस’ एजेंडा था?

मोदी सरकार ने मस्क की मौजूदगी के बारे में खुलासा क्यों नहीं किया?

हमें इस बारे में अपनी सरकार के बजाय किसी दूसरे देश से जानकारी क्यों मिल रही है?

युद्ध के दौरान ट्रंप ने अलग-अलग देशों के नेताओं से बात की थी, कि लेकिन उन कॉल्स में कोई भी बिजनेसमैन शामिल नहीं था. ऐसा सिर्फ पीएम मोदी के साथ ही क्यों हुआ?

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