बिहार में 16 मार्च को होने वाला राज्य सभा के 5 सीटों पर होने वाला चुनाव कई मायने में महत्वपूर्ण साबित होने वाला है। सरसरी निगाहों से देखें तो वर्तमान स्थिति में बिहार में ही रहे 5 सीटों के राज्यसभा चुनाव में एक सीट पर चुनाव जीतने के लिए उम्मीदवारों के पक्ष में 41 विधायकों का समर्थन होना चाहिए। इस लिहाज से एनडीए जिनके पास 202 विधायकों का समर्थन है, वह चार सीटें तो अकेले अपने दम पर जीत सकती है, लेकिन पांचवी सीट पर जीत के लिए इसे जुगत लगानी होगी। यह तीन विपक्षी विधायकों का जुगाड़ कर ऐसा करने में सफल भी हो सकता है। और ऐसा करने में अगर यह सफल हो जाता है तो इसके बिहार के भविष्य की राजनीति के दृष्टिकोण से बीजेपी के लिए काफी अनुकूल स्थिति मानी जायेगी।तब यह माना जा सकता है कि नीतीश कुमार ने बीजेपी के सामने पूरी तरह से सरेंडर कर दिया है और 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के बाद से लेकर अबतक के एक लंबे समय अंतराल के बाद बिहार में पहली बार भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री के नेतृत्व में सरकार बनाने जा रही है। इससे पूर्व तक भारतीय जनता पार्टी कई अवसरों पर बिहार विधान सभा में सबसे बड़ा राजनीतिक दल होने के बावजूद नीतीश कुमार के तिकड़मों में फंसकर नीतीश कुमार के मुख्यमंत्रीत्व में सरकार बनाने के लिए विवश थी।
बिहार में होने वाले राज्यसभा के चुनाव में अगर एनडीए पांचों सीट जीत जाती है, तो इसका एक बड़ा परिणाम यह भी होगा कि विपक्षी गठबंधन यहां और कमजोर हो जाएगा। भारतीय जनता पार्टी के पास पैसे हैं ईडी,सीबीआई और इनकम टैक्स के रूप में किसी को भी परेशान करने वाली ताकत है,जिसके बल पर यह किसी भी विपक्षी राजनीतिक दल के विधायक को तोड़कर अपने उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करवा सकता है और ऐसा करना कोई कठिन भी नहीं है,क्योंकि राज्यसभा के चुनाव के दौरान होने वाले मतदान को लेकर किसी राजनीतिक दल के द्वारा जारी किया गया व्हिप भी क्रॉस वोटिंग करने वाले विधायकों के ऊपर किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव नहीं डाल सकता है। हां पार्टी इस बात के उजागर होने पर पार्टी स्तरीय कोई दंड उसे जरूर दे सकती है, लेकिन उसकी विधानसभा की सदस्यता अक्षुण्य बनी रहेगी।
एनडीए के द्वारा बिहार में राज्यसभा के होने वाले पांच सदस्यों के चुनाव में पांचो सीटों पर जीत हासिल करने का एक बड़ा लाभ बीजेपी के पक्ष में यह होगा कि अब नीतीश कुमार भी इसलिए थोड़ा डरे रहेंगे कि बीजेपी अगर अपने पैसे और ताकत का उपयोग कर विपक्षी गठबंधन के सदस्यों को तोड़कर अपने पाले में कर सकती है तो शायद जेडीयू के साथ भी वह ऐसा कोई बड़ा खेल कर दे कोई आश्चर्य नहीं। नीतीश कुमार पहले भी एक बार जब बीजेपी का साथ छोड़कर विपक्षी महागठबंधन में गए थे तो उन्होंने भाजपा पर अपनी पार्टी को तोड़कर अपनी पार्टी में मिलने की बात कही थी।और अगर अभी बीजेपी जेडीयू के साथ ऐसा कोई बड़ा खेल कर देती है, तो उनके बेटे निशांत कुमार का राजनीतिक भविष्य भी चौपट हो सकता है।
हालांकि इन तमाम बीजेपी के अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद नीतीश कुमार बीजेपी की सोच पर पानी फेरने वाला कोई कदम नहीं उठा सकते हैं ऐसा भी नहीं है। और यह भी इस राज्यसभा के चुनाव में ही परिलक्षित हो जाएगा। इस चुनाव में अगर नीतीश कुमार अपनी जीत के लिए आवश्यक 41 विधायकों के समर्थन के अलावा अपने 44 विधायक से आरजेडी के उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करवा देते हैं तो आरजेडी का उम्मीदवार जीत जाएगा और एनडीए को माइंस जेडीयू के रूप में तीन ही सीटों पर संतोष करना पड़ेगा। लेकिन नीतीश कुमार के लिए यह स्थिति भी भविष्य में बड़ा संकट उत्पन्न करने वाला ही होगा। क्योंकि तब आरएलएसएम के उपेंद्र कुशवाहा का चुनाव जीतना संदिग्ध हो सकता है, जिसे नीतीश कुमार का समर्थक माना जाता है। और जिसको लेकर यह संभावना व्यक्त की जाती है कि अगर नीतीश कुमार पलटी मार कर विपक्षी गठबंधन की सरकार बनना चाहे तो उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी आरएलएसएम का समर्थन उन्हें मिल सकता है,वह लाभ राज्यसभा के चुनाव में तिकड़म करने पर नीतीश कुमार को नहीं मिलेगा। और यह नीतीश कुमार के लिए राज्य सभा का चुनाव जीतकर बाद में विपक्षी गठबंधन की सरकार बनाने के मार्ग में एक बड़ा रोड़ा साबित हो जाएगा। राज्य सभा का चुनाव जीतकर अगर नीतीश कुमार विपक्षी गठबंधन की सरकार बनाना चाहें तो जेडीयू 85 प्लस महागठबंधन 35 को मिलाकर कुल विधायकों का आंकड़ा 120 ही रह जाएगा जो सरकार बनाने के लिए आवश्यक जादुई आंकड़ा 122 से 2 कम ही रह जाती है। उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के समर्थन मिलने पर यह आसानी से पूरा हो सकता है,लेकिन यह तब होगा जब नीतीश कुमार राज्य सभा की चुनाव में उन्हें जितने में मदद करेंगे।
इसके अलावा और भी कई संभावनाएं और विडम्बनाएं भी इस राज्यसभा चुनाव के साथ जुड़ी हुई है जो कल के राज्यसभा चुनाव परिणाम आने के बाद परिलक्षित होंगे।
