एनडीए में पीएम नरेंद्र मोदी और बिहार के सीएम नीतीश कुमार के बीच जोर आजमाइश

0
3

ऊपर से देखने में तो एनडीए खेमे में बड़ी एकजुटता नजर आती है। लेकिन जब आप इसके अंदर खाने में झांकेंगे, तब आपको देखने में आयेगा कि यहां इस गठबंधन की सबसे बड़े घटक दल बीजेपी का सबसे ताकतवर व्यक्ति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जेडीयू के सबसे कद्दावर व्यक्ति बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बीच बड़ी कटुता है। दोनों के बीच की यह कटुता कोई नई नहीं है। कहलाने एक बसत, अहि मयूर मृग बाघ, जगत तपोवन सो किए तीरथ दाघ निदाघ। की तर्ज पर यह ऊपर से एनडीए के रूप में भले ही साथ-साथ दिखते हो,लेकिन एनडीए में रहते हुए भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बीच का अंतर्कलह चल रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार के मुख्यमंत्री नरेश नीतीश कुमार को राज्यसभा के लिए निर्वाचित करवा कर उन्हें बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी से दूर करने में जुड़े हुए हैं तो वहीं नीतीश कुमार समृद्धि यात्रा करके बिहार में बीजेपी के मुख्यमंत्री बनने की स्थिति के बावजूद सब कुछ आगे अपने निर्देशन में चलने का ताना-बाना बोलने में लगे हुए हैं ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंशा पर पानी फेर सके
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अंतर्कलह का इतिहास काफी पुराना है और वहां से शुरू होता है जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री। दो अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्री, और वह भी एनडीए के ही खेमे से। यानी आपसी अंतर्कलह की कोई संभावना दूर-दूर तक नहीं। लेकिन फिर भी दोनों के बीच गंभीर अंतर्कलह है।

वर्ष 2008 में बिहार में कोसी नदी में बाढ़ के तौर पर एक भयानक आपदा आती है। कई व्यक्तियों और संगठनों की तरफ से बिहार में बाढ़ राहत के सहयोग के लिए सहयोग राशि आती है। इस सहयोग राशि में 5 करोड रुपए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा भी भेजे गए हैं।बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अन्य सभी के द्वारा भेजी गई सहयोग राशियों को तो रख लेते हैं,लेकिन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के भेजे गए 5 करोड रुपए की सहायता राशि वापस लौटवा देते। इतना ही नहीं नीतीश कुमार ने अपने साथ होने वाले गुजरात के मुख्यमंत्री के भोज के कार्यक्रम को भी रद्द करवा देते हैं।फिर नीतीश कुमार वर्ष 2010 के विधान सभा चुनाव में एनडीए के अंतर्गत चुनाव लड़ते हुए भी बीजेपी को अपने स्टार प्रचारक के रूप में नरेंद्र मोदी को बिहार बुलाने के कार्यक्रम को रद्द करवा देते है।

इस बीच गुजरात में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व एनडीए विधानसभा का चुनाव जीत जाती और बिहार में भी नीतीश कुमार की अगुवाई में एनडीए ने विधानसभा का चुनाव जीत लिया। लेकिन आपसी कटुता की वजह से ना तो गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने और ना ही बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शिष्टाचारवश भी एक दूसरे को बधाई दी। यहां तक की जब वर्ष 2014 के आमसभा चुनाव को लेकर एनडीए ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अगला प्रधानमंत्री पद का चेहरा घोषित कर दिया तो नीतीश कुमार को यह काफी खल गया और उन्होंने नरेंद्र मोदी पर सनकी,हिंदू धर्मावलंबी और मुसलमान विरोधी बताते हुए उनके प्रधानमंत्री के चेहरे होने को लेकर एनडीए के अंदर बड़ा सवाल उठा दिया ।और जब बीजेपी तथा एनडीए ने उनकी बात नहीं मानी तब उन्होंने एनडीए से अपना नाता ही तोड़ लिया और बिहार में कांग्रेस तथा आरजेडी के साथ महागठबंधन कर अपनी सरकार बचा ली।

एनडीए से अलग होने के बाद नीतीश कुमार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता से बेदखल करने के अपने प्रयास में लगातार जुटे रहे और विपक्षी खेमे के साथ मिलकर चुनाव लड़ते रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनाव में हराने के लिए वे कभी विपक्षी गठबंधनों के साथ तो कभी एनडीए के साथ रहकर भी चुनाव लड़ते रहे और बिहार में पलट-पलट कर कभी एनडीए के साथ तो कभी कांग्रेस और आरजेडी के साथ जाकर अपने मुख्यमंत्रीत्व वाली सरकार बनाते रहे।

2024 के लोकसभा चुनाव में तो इन्होंने सभी विपक्षी गठबंधन को मिलकर इंडिया एलायंस का निर्माण कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हटाने की एक बड़ी चाल चली थी। लेकिन जब उन्होंने इसमें खुद को इंडिया एलायंस के अंतर्गत पीएम के उम्मीदवार बनने की संभावना नहीं देखी ,तो इसे छोड़कर इस भरोसे एनडीए से मिल गए कि ऐसा कर वे प्रधानमंत्री न सही बिहार के मुख्यमंत्री तो बने रहेंगे क्योंकि आरजेडी तो इन्हें मुख्यमंत्री के पद से धक्का मार कर हटाकर तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाने में जुट गई थी।

लेकिन इस बार एनडीए में आकर भी नीतीश कुमार की मुख्यमंत्री की कुर्सी सुरक्षित नहीं रह सकी और लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीतीश कुमार के राज्यसभा भेजकर नीतीश कुमार द्वारा बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली करने की पटकथा लिख दी है।

नीतीश कुमार के राज्यसभा में जाने के बाद बिहार में एनडीए का ही मुख्यमंत्री बना रहेगा, अलबत्ता अगाला मुख्यमंत्री जेडीयू का नहीं बल्कि बीजेपी का होगा। लेकिन इस परिवर्तन की अटल संभावना के बावजूद बिहार के एनडीए खेमे के अंतर्गत बीजेपी और जेडीयू के बीच होड़ मची हुई। बीजेपी की राजनीति के कर्ता-धर्ता नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी अपने भावी मुख्यमंत्री के चुनाव के द्वारा आने वाले दिनों में बिहार में जेडीयू की राजनीतिक पकड़ को कम करने के प्रयास में जुटी हुई है तो नीतीश कुमार राज्यसभा में जाने के बावजूद बिहार में बीजेपी को अपना राजनीतिक कद बढ़ाने का अवसर नहीं देने के प्रयास में जुटी हुई।

अपने इस प्रयास को धार देते हुए बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार राज्यसभा के लिए निर्वाचित हो जाने के बावजूद समृद्धि यात्रा के दौरान जगह-जगह जा रहे हैं और लोगों को यह बता रहे हैं कि मजबूरी में भले ही उन्हें बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ रही है,लेकिन अगर जनता का समर्थन उनके साथ रहा तो बिहार की राजनीति में बीजेपी के मुख्यमंत्री बनने के बावजूद वे बिहार में अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखेंगे और बिहार की जनता के लिए लोक कल्याणकारियों कार्यों को आगे भी करते रहेंगे। इस दौरान में बीजेपी के खेमा के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को भी लगातार अपने साथ रख रहे हैं और उनसे भी अपनी बड़ाई करवा रहे हैं।उन्हें बिहार का भाभी मुख्यमंत्री बता रहे हैं। और अगर बीजेपी ऐसा नहीं करती है और सम्राट चौधरी की जगह दूसरे को बिहार का मुख्यमंत्री बना देती है,तब बहुत संभव है की नीतीश कुमार भले ही बिहार के मुख्यमंत्री नहीं रहे लेकिन जेडीयू के अंतर्गत वे ऐसी ही यात्रा जगह-जगह निकालकर लोगों के मन में बीजेपी के प्रति अविश्वास की भावना बढ़ाते ते रहेंगे और फिर कोई उपयुक्त मौका देखकर जब उन्हें लगेगा कि स्थिति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व वाली बीजेपी को पटकनी देने की स्थिति में आ गए हैं तो एक बार फिर से खुल्लम-खुल्ला उनका विरोध कर सकते हैं। ऐसे में बिहार में बीजेपी और जेडीयू के बीच नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के द्वारा शह और मात का जो खेल अभी चल रहा है ,उसमें जीत किसकी होगी और मात किसकी होगी यह तो वक्त ही बताएगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here