राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जबसे दूसरी बार अमेरिका के राष्ट्रपति बने हैं, तबसे पूरी दुनिया पर अपनी दादागिरी दिखाने में जुट गए हैं। इसराइल के साथ मिलकर ईरान पर ताजा हमला भी उनका ऐसा ही एक प्रयास है। लेकिन ईरान ने इस युद्ध में उनकी सारी हेकड़ी को चूरकर कर रख दिया है। अब हालात ऐसे बनने लगे हैं कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को इस युद्ध में अपनी बड़ी हार दिखने लगी है। उन्हें लगने लगा है इस ईरान युद्ध में भी उनकी वजह से अमेरिका की वही हालत होने वाली है जो कभी वियतनाम और अफगानिस्तान के साथ हुए युद्ध में हुआ था।
इस युद्ध को डोनाल्ड ट्रंप ने सोचा था कि इजरायल के साथ मिलकर वह दो-चार दिनों में ही ईरान को घुटने पर ला देगा और फिर उसके तेल भंडार पर कब्जा कर लेगा और फिर पेट्रो डॉलर के रूप में बड़ी संपत्ति हासिल करने के अलावा दुनिया भर के देशों पर अपना दादागिरी भी दिखायेगा। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादरो को उसके राष्ट्रपति भवन से बेड़ियां में जकड़ कर अमेरिका लाकर अमेरिकी कोर्ट में उन पर मुकदमा चलाने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी दादागिरी दिखाते हुए डेनमार्क के अधीन स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड को खरीदने या उसे अमेरिका में शामिल करने की जिद पकड़ ली ।इसे उन्होंने “एक बड़ा रियल एस्टेट सौदा” बताया। उन्होंने इसे रणनीतिक और सुरक्षा कारणों से जरूरी बताते हुए, न बेचने पर डेनमार्क को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी थी। इसके तहत उन्होंने ग्रीनलैंड में रहने वाले लोगों को पैसे के बल पर खरीद लेने की बात कही थी और ग्रीनलैंड के निवासियों के इसे नहीं मानने पर डेनमार्क पर बड़ा सैन्य हमला करने की भी बात कही थी। ईरान के युद्ध में अगर डोनाल्ड ट्रंप की जीत होती तो निश्चय ही यहां से प्राप्त अकूत संपत्ति के बल पर या तो ग्रीनलैंड को खरीद लेते या नहीं तो ईरान के जीतने की बात कह अपने दादागिरी को और आगे बढ़ाने के लिए डेनमार्क पर हमला कर सिर्फ ग्रीनलैंड ही नहीं, डेनमार्क को भी अमेरिका में शामिल करने का प्रयास करते। लेकिन ईरान युद्ध में तो इनके लिए सिर मुंडाते ही ओला पड़ने वाली बात हो गई। इसराइल के साथ मिलकर ईरान पर बड़ा हमला बोलकर लड़ाई तो इन्होंने युद्ध तो छेड़ दिया, लेकिन जिस तरह से ईरानी सूरमाओं ने मिसाइलों से ड्रोनों से पटवार करना शुरू कर दिया उससे अब डोनाल्ड ट्रंप को दिन में ही तारे दिखने लगे हैं। अपनी सारी हेकड़ी भूलकर अब ट्रंप अपनी भद और ज्यादा ना पिटे इसकी जुगाड़ में लग गए हैं। इसके तहत उन्होंने 5 दिनों तक ईरान पर परमाणु ठिकाने, तेल के ठिकाने और कई महत्वपूर्ण जगह पर अमेरिकी हमला न करने की बात कही है।
ईरान के साथ चल रहा अमेरिका और इजरायल का यह युद्ध अगर किसी संधि से समाप्त होता है तो डोनाल्ड ट्रंप की सारी हेकड़ी निकल जाएगी। इससे डोनाल्ड ट्रंप अब ग्रीनलैंड को लेकर डेनमार्क पर हमला करने की तो नहीं ही सोचेगा, पूरी दुनिया को भी जिस प्रकार से कहीं टैरिफ के बहाने तो कहीं जैन जी को भड़का कर तो कहीं सीधे आक्रमण कर आतंक फैला रहा था,उससे भी मुक्ति मिल जाएगी।
भले ही अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर आक्रमण कर ईरान के सुप्रीम कमांडर अयातुल्लाह अली खामनेई की हत्या लड़ाई के पहले ही दिन कर दी थी, जिसकी आधिकारिक पुष्टि भी तीन दिनों के अंदर हो गई । तब यह लगने लगा था कि अमेरिका आसानी से यह युद्ध जीत लेगा। डोनाल्ड ट्रंप ने तो अपने कई वक्तव्य में इसे लेकर ईरान जीतने और जल्दी ही युद्ध खत्म होने की बात भी कह दी थी। इसके बाद जब अयातुल्लाह अली खामनेई के बेटे मोजतवा खामनेई ने ईरान के सुप्रीम कमांडर का पद ग्रहण किया तो अमेरिकी और इजरायली सैनिकों ने इसे भी जख्मी कर देने की बात कही। इसके अलावा अमेरिकी और इजरायली फौज ने ईरान के सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव लारिजानी और नेशनल डिफेंस काउंसिल के प्रमुख अली शामखानी समेत ईरान कई प्रमुख हस्तियों को भी मार गिराया। लेकिन इस दौरान ऐसा कभी नहीं हुआ जबकि ईरानी सैनिकों का मनोबल कमजोर हुआ हो, या उसके तरफ से पलटवार में कोई कमी आई हो। ऐसा प्रतीत होने लगा था मानो ईरान कोई रक्तबीज हो जहां एक के हमले में मरने के बाद दूसरा उसका स्थान लेकर अपने पलटवार से अमेरिका और इसराइल के नाकों में दम कर दे रहा है।
अपने शुरुआती पलटवार में तो ईरान ने सीधे कभी अमेरिका पर हमला नहीं किया,लेकिन इसराइल पर लगातार मिसाइल और ड्रोन वर्षा कर इसराइल के आयरन डोम से प्रसिद्ध intercepter मिसाइल की हवा निकाल दी। इतना ही नहीं।,ईरान ने दक्षिणी इज़राइल के नेगेव रेगिस्तान में स्थित डिमोना (Dimona) (शिमोन पेरेस नेगेव परमाणु अनुसंधान केंद्र) के पास के क्षेत्रों में बैलिस्टिक मिसाइलें दागकर हमला किया, जो देश का एक प्रमुख परमाणु स्थल माना जाता है।
ईरान से अमेरिका की दूरी 5000 किलोमीटर होने की वजह से ईरान भले ही प्रत्यक्ष तौर पर अमेरिका पर हमला नहीं कर रहा है ,लेकिन यूएई सऊदी अरब आदि जिन देश में अमेरिका का डिफेंस बेस है, उन देशों पर हमला कर डोनाल्ड ट्रंप को बेचैन कर रहा है क्योंकि यह देश भी अब अमेरिका पर युद्ध रुकवाने के लिए दबाव बनाने लगे हैं। हाल में हिंद महासागर के डियागो गार्सिया में मिसाइल हमला कर ईरान ने डोनाल्ड ट्रंप को बुरी तरह से डरा दिया है। डियागो गार्सिया अमेरिका और इंग्लैंड के संयुक्त प्रभाव में है। माना जाता है कि जिस दिन इंग्लैंड ने अमेरिका को यहां से अपने सैन्य संचालन की स्वीकृति दी थी, उसी दिन ईरान ने अपने मिसाइल से यहां हमला कर इंग्लैंड को भी यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि वह इस हमले में अमेरिका का साथ खुलकर देने से पहले सौ बार अपने परिणाम के बारे में भी सोच ले।
हारमुज स्ट्रेट पर भी अपना दबदबा बरकरार रखकर ईरान ने डोनाल्ड ट्रंप के नाकों में दम कर रखा है।ईरान ने थाईलैंड के ध्वज वाले एक बल्क कैरियर जहाज ‘मयुरी नारी’ को निशाना बनाया, जिससे ओमान के पास उसके इंजन रूम में आग लग गई। इसके अलावा, ईरान द्वारा इजराइल और संयुक्त राज्य अमेरिका से जुड़े या उन पर शक वाले जहाजों को भी निशाना बनाने की खबरें आई हैं। बार-बार डोनाल्ड ट्रंप हारमुज स्ट्रेट को खुला देने की बात कर रहे हैं ,लेकिन ऐसा कुछ होता नजर नहीं आ रहा है। यहां से सिर्फ उसी देश के जहाज आवाजाही का रहे हैं, जिसका अनुमोदन ईरान करता है।इसके तहत भारत के भी चार जहाज एलपीजी और क्रूड ऑयल लेकर भारत आया है। इसे खुलवाने को लेकर डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो यूरोपीय संगठन समेत कई देशों से मदद मांगी लेकिन ईरान के पलटवार को देखते हुए किसी भी देश ने डोनाल्ड ट्रंप का इस मामले में साथ नहीं दिया। अब डोनाल्ड ट्रंप इसे लेकर कभी अमेरिका के जहाज के इस तरफ से नहीं जाने की बात कह कर इस मुद्दे से अपना हाथ पीछे खींचने लगते हैं, तो कभी ईरान को धमकी देते हैं कि अगर उसने दो दिनों के अंदर हारमुज स्ट्रेट को सामान्य आवाजाही के लिए नहीं खोला तो उस पर परमाणु हमला किया जाएगा।
इस बीच जब डोनाल्ड ट्रंप को इस बात की खुफिया जानकारी लगी की ईरान के इस पलटवार में रूस और चीन उसकी मदद कर रहा है ,तबसे उसकी नींद और उड़ गई है। ईरान भी बीच-बीच में अपने मिसाइल और ड्रोनों के भंडार वाले वीडियो दिखाकर डोनाल्ड ट्रंप की बेचैनी को बढ़ते रहता है। अमेरिका में भी डोनाल्ड ट्रंप पर नाहक ईरान पर हमला करने का आरोप लगने लगा है। अमेरिकी अपने देश के सैनिकों की सुरक्षा , इस पर होने वाले भारी खर्च तथा पेट्रोल और डीजल के दामों में वृद्धि होने से उत्पन्न मुद्रास्फीति को लेकर डोनाल्ड ट्रंप को घेरने लगे हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कांग्रेस के समर्थन के बिना ही अमेरिका को युद्ध में धकेल दिया, लेकिन सांसद यह सवाल उठा रहे हैं कि ईरान के साथ युद्ध कब, कैसे और किस कीमत पर समाप्त होगा।युद्ध शुरू हुए तीन सप्ताह हो चुके हैं और अब इसके परिणाम स्पष्ट होने लगे हैं। कम से कम 13 अमेरिकी सैन्यकर्मी मारे गए हैं और 230 से अधिक घायल हुए हैं। पेंटागन द्वारा युद्ध निधि (वॉर फंड) के लिए 200 अरब अमेरिकी डॉलर का अनुरोध व्हाइट हाउस में पेंडिंग है।
ईरान के इस पलटवार ने ईरान को घुटने पर लाकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के तेल भंडार पर कब्जा कर बड़ा पैसा बनाने और अपनी दादागिरी पूरी दुनिया पर दिखाने का जो प्रयास किया था, उसे ईरान ने पूरी तरह से विफल कर दिया है।और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब खुद घुटने पर आ गए दिखाई पड़ने लगे हैं। जिस तरह से डोनाल्ड ट्रंप ने 5 दिनों तक ईरान के परमाणु ठिकाने पेट्रोलियम संयंत्रों और अन्य महत्वपूर्ण स्थान पर हमला न करने की बात कही है और उधर ईरान भी युद्ध का हर्जाना देने जैसी कुछ बातों को कहकर संधि का प्रस्ताव लाकर युद्ध को समाप्त करने की बात कर रहा है। इसे देखते हुए एक आशा बंधी है कि ईरान तथा इजराइल और अमेरिका के बीच चल रहा है यह युद्ध जल्दी समाप्त हो जाएगा।और अगर ऐसा जल्दी हो जाता है तो यह पूरी दुनिया के लिए एक राहत भरी बात होगी। फिलहाल इस युद्ध के कारण होने वाली मुद्रा स्थिति से तो लोगों को निजात मिलेगा ही, भविष्य में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दादागिरी से भी दुनिया को छुट्टी मिल जाएगी।

