राज्यसभा सदस्य सुनेत्रा पवार को उनके पति और उपमुख्यमंत्री अजित पवार के निधन के तीन दिन बाद शनिवार को महाराष्ट्र में सर्वसम्मति से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के विधायक दल की नेता चुनी गईं।NCP विधायक दल की नेता के रूप में सुनेत्रा पवार के नाम का प्रस्ताव वरिष्ठ नेता दिलीप वालसे पाटिल ने किया।खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री छगन भुजबल ने इसका समर्थन किया।
शपथ ग्रहण से पहले सुनेत्रा पवार ने अपने दिवंगत पति की तस्वीर पर पुष्पांजलि अर्पित की। उनके छोटे बेटे जय भी इस अवसर पर मौजूद थे। विधान भवन परिसर में प्रवेश करते समय कई मंत्री और विधायक भावुक दिखाई दिए।
महाराष्ट्र की नई डिप्टी सीएम बनने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुनेत्रा पवार को शुभकामनाएं दीं।
सुनेत्रा पवार के शपथ ग्रहण समारोह में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, विधान परिषद की डिप्टी चेयरपर्सन डॉ. नीलम गोरहे, मंत्री छगन भुजबल, मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले और अन्य नेता शामिल हुए।
बारामती में 28 जनवरी को हुई एक विमान दुर्घटना में मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस के नेतृत्व वाली महायुति सरकार में उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री रहे अजित पवार और चार अन्य लोगों की मौत हो गई थी।
सुनेत्रा पवार ने साल 2024 में बारामती से लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था, उन्हें अपनी ननद और राकांपा (एसपी) की मौजूदा सांसद सुप्रिया सुले से पराजय का सामना करना पड़ा था। इसके बाद सुनेत्रा पवार राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुईं।
महाराष्ट्र की राजनीति में पिछले 72 घंटे किसी भूचाल से कम नहीं रहे। बुधवार को हुई विमान दुर्घटना में एनसीपी प्रमुख और उप मुख्यमंत्री अजित पवार के आकस्मिक निधन (Ajit Pawar Death) ने पूरे देश को हैरान कर दिया है। लेकिन, इस त्रासदी के बीच जिस तेजी से उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार को शनिवार शाम डिप्टी सीएम पद (Sunetra Pawar Deputy CM) की शपथ दिलाई गई, उससे कई सवाल पैदा हो गए हैं। शोक की घड़ी में भी राजनीतिक बिसात बिछाई गई। आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि अजित पवार के दाह संस्कार के तुरंत बाद ही सत्ता का हस्तांतरण करना पड़ा? इसके पीछे की वजह केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि ‘अस्तित्व बचाने’ का एक बड़ा खेल है।
सियासी गलियारों के सूत्रों के मुताबिक, इस जल्दबाजी का सबसे बड़ा कारण शरद पवार की एनसीपी और अजित पवार गुट के बीच होने वाला संभावित विलय था। खबर है कि 17 जनवरी को दोनों गुटों में एक गुप्त समझौता हुआ था, जिसके तहत 12 फरवरी को पार्टी के एकीकरण का ऐलान होना था। अजित पवार के खेमे के दिग्गज नेता—प्रफुल्ल पटेल, छगन भुजबल और सुनील तटकरे—इस बात से डर गए थे कि अगर अजित दादा के बिना विलय हुआ, तो एकीकृत पार्टी पर पूरी तरह से शरद पवार (सीनियर पवार) का कब्जा हो जाएगा। ऐसे में अजित गुट के नेताओं का प्रभाव खत्म हो जाता। इसलिए, विलय की तारीख से पहले ही उन्होंने कमान अपने हाथ में रखने के लिए सुनेत्रा पवार को आगे कर दिया।
हैरानी की बात यह है कि सुनेत्रा पवार को पार्टी अध्यक्ष और विधायक दल का नेता चुनने के फैसले में एनसीपी के संस्थापक शरद पवार की कोई राय नहीं ली गई। शनिवार सुबह बारामती में शरद पवार ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए साफ कहा कि उन्हें इस फैसले की भनक तक नहीं थी। उन्हें प्रक्रिया से बाहर रखना यह साबित करता है कि अजित गुट के नेता सीनियर पवार के ‘वीटो पावर’ से बचना चाहते थे। वे जानते थे कि अगर शरद पवार बीच में आए, तो वे अपनी शर्तों पर पार्टी चलाएंगे।
अजित गुट के नेताओं की घबराहट के पीछे एक और बड़ी वजह ‘कानूनी पचड़े’ हैं। महायुति (BJP गठबंधन) में शामिल होने से पहले कई नेताओं पर ईडी (ED), सीबीआई (CBI) और एसीबी (ACB) की जांच चल रही थी। सत्ता में रहने की वजह से उन्हें इन एजेंसियों से राहत मिली हुई है। शरद पवार पहले ही कह चुके हैं कि वे किसी भी कीमत पर बीजेपी के साथ नहीं जाएंगे। ऐसे में अगर पार्टी एक होती और एनडीए से बाहर आती, तो इन नेताओं पर फिर से कानूनी शिकंजा कसने का डर था। सत्ता और सुरक्षा बनाए रखने के लिए सुनेत्रा पवार की ताजपोशी जरूरी थी।
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि सुनेत्रा पवार का चयन इसलिए भी किया गया, क्योंकि वे राजनीति में अपेक्षाकृत नई हैं। ध्यान रहे कि 2024 के लोकसभा चुनाव में बारामती से अपनी ननद सुप्रिया सुले से हारने के बाद उनकी राजनीतिक पकड़ बहुत मजबूत नहीं मानी जाती। अजित गुट के वरिष्ठ नेताओं को लगता है कि सुनेत्रा के नाम पर सहानुभूति मिलेगी, लेकिन असली ‘रिमोट कंट्रोल’ उनके हाथ में रहेगा। एक अनुभवहीन नेता के जरिये पार्टी पर पकड़ बनाए रखना इन दिग्गजों के लिए आसान होगा।
सुनेत्रा पवार को अजीत पवार के लगभग सभी जिम्मेदारियां सौंप दी गई हैं, सिवाय वित्त मंत्रालय के। वित्त विभाग अब मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के पास रहेगा। सियासी गलियारों में चर्चा है कि सुनेत्रा की यह नियुक्ति एक ‘स्टॉप-गैप अरेंजमेंट’ (अस्थायी व्यवस्था) हो सकती है। असली खेल तब शुरू होगा जब विलय की तारीख नजदीक आएगी।
