मौत की सजा के लिए फांसी की जगह दूसरे तरीके अपनाए जाने की मांग करने वाली जनहित याचिका पर गुरुवार (22 जनवरी, 2026) को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया। याचिका में फांसी को तकलीफदेह और क्रूर तरीका बताते हुए घातक इंजेक्शन देने, गोली मारने या इलेक्ट्रिक चेयर का इस्तेमाल करने जैसे तरीके अपनाने की वकालत की गई है।पिछली सुनवाई में कोर्ट ने भी इस बात पर जोर दिया था कि सरकार को बदलते समय के साथ नए विकल्पों पर विचार करना चाहिए।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि उसने इस विषय पर विचार करने के लिए एक कमेटी का गठन किया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई पूरी कर ली है। यह याचिका सीनियर एडवोकेट ऋषि मल्होत्रा ने दायर की है। उन्होंने फांसी को मौत देने का क्रूर, अमानवीय और पुराना तरीका बताया है, जिसमें दोषी को लंबे समय तक दर्द सहना पड़ता है। उन्होंने सुझाव दिया कि फांसी की बजाय जहर का इंजेक्शन (लीथल इंजेक्शन) दिया जाए, जो तेजी से और कम पीड़ा के साथ मौत का कारण बनता है।याचिका में कहा गया है कि कम से कम दोषी को विकल्प दिया जाए कि वह फांसी चाहता है या इंजेक्शन।
सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल ने केंद्र का पक्ष रखते हुए कोर्ट को बताया कि सरकार ने इस मुद्दे पर विचार करने के लिए एक कमेटी बनाई है, जो वैकल्पिक तरीकों पर अध्ययन कर रही है। सरकार ने साफ किया कि फिलहाल फांसी को सबसे तेज और सुरक्षित तरीका माना जा रहा है, इसलिए वह इसे बदलने के पक्ष में नहीं है।
कोर्ट ने केंद्र के इस रुख पर नाराजगी जताई और कहा कि समय के साथ बदलाव जरूरी है, लेकिन सरकार इसमें तैयार नहीं दिख रही।कोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान दयालु और जीवंत है, जिसमें सम्मानजनक मौत का अधिकार भी शामिल होना चाहिए।
यह याचिका साल 2017 में दायर की गई थी और तब से कई बार इस मामले में सुनवाई हो चुकी है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता और केंद्र सरकार को तीन हफ्ते के अंदर लिखित दलीलें जमा करने का निर्देश दिया है। यह मामला मौत की सजा के तरीके को लेकर महत्वपूर्ण है, क्योंकि कई देशों ने फांसी छोड़कर इंजेक्शन लगाने जैसे तरीके अपना लिए हैं। भारत में अभी आपराधिक प्रक्रिया संहिता (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के तहत फांसी ही निर्धारित तरीका है।
