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बीजेपी से करीब 2% मतदान प्रतिशत बढ़त के बाद भी तीसरे नंबर पर आरजेडी

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बिहार चुनाव जीतने के लिए धुर विरोधी धड़ों को जोड़कर महागठबंधन बनाया गया था। सारा गुणा-गणित किया गया। मगर, तेजस्वी यादव की अगुवाई वाला महागगठबंधन की महा हार हो गई। इतनी सियासी छीछालेदर शायद अबतक कभी नहीं हुई हो। मगर, एक मामले में आरजेडी नंबर वन बन गई और बीजेपी दूसरे नंबर पर आ गई। यह मामला है पार्टी को मिले मतदान प्रतिशत का।

पूरे बिहार में जाति की राजनीति करने वाली और मुस्लिम-यादव समीकरण को बखूबी बैठाने वाली आरजेडी से इस बार भयानक चूक हो गई। लालू यादव ने यह सीख दी थी, मगर लगता है तेजस्वी यादव इसमें चूक गए या आकलन में ही कोई कमी रह गई। बिहार में पूरी तरह जनाधार खो देने वाली कांग्रेस को 61 सीट देना एक बड़ी गलती थी। सीटों का ऐसा ही बंटवारा पिछली बार भी किया गया था, जिस पर लालू काफी नाराज भी दिखे थे। उस वक्त 70 सीटें दी गई थीं और कांग्रेस महज 19 ही लेकर आई। इस बार वह और रसातल में जाते हुए करीब 3 सीटें ही मुश्किल से जीतती नजर आ रही है।

चुनाव आयोग की वेबसाइट पर दिए आंकड़ों के अनुसार, जो रुझान दिख रहे हैं, उसके मुताबिक बीजेपी को 96, जदयू को 84, आरजेडी को 24, लोजपा को 19 सीटें और कांग्रेस को महज 1 ही सीटें मिलती दिख रही हैं। इन आंकड़ों को देखें तो महागठबंधन को सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस ने ही किया है। क्योंकि जो 61 सीटें दी गई थीं, उसमें वह बस 1 ही में ही बढ़त बनाती दिख रही है।

मौजूदा चुनाव में भले ही बीजेपी सबसे ज्यादा सीटें जीतती दिख रही है, मगर वोट प्रतिशत के मामले में आरजेडी से पीछे है। जहां बीजेपी को 20.80 फीसदी वोट मिले हैं। वहीं, आरजेडी को 22.73 फीसदी वोट मिले हैं। वहीं, सीटों के मामले में दूसरे नंबर पर जीतती दिख रही जदयू को 18.83 फीसदी वोट मिले है। कांग्रेस को 8.56 फीसदी वोट मिले हैं, जो महज 1 सीट ही जीतती दिख रही है।

2010 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान जेडीयू को 115, बीजेपी को 91, आरजेडी को 22 और कांग्रेस को 4 सीटें मिली थीं। इस बार यह रिकॉर्ड टूटता दिख रहा है। इस बार एनडीए को 208 सीटें मिल रही हैं। वहीं, महागठबंधन को महज 28 सीटें मिलती नजर आ रही हैं।

मौजूदा आंकड़ों को देखें तो कांग्रेस ने हमेशा से महागठबंधन की नैया ही डुबाई है। बिहार में फिलहाल कांग्रेस का जनाधार तकरीबन खत्म हो चुका दिखता है। वह एक तरह महज से परजीवी पार्टी बनकर रह गई है। इसके पीछे सबसे बड़ी बात यह है कि बिहार में कांग्रेस की जमीन तकरीबन सिमट चुकी है। वह मतदाताओं को रिझा नहीं पाई। पिछली बार भी कांग्रेस ने महागठबंधन की नैया डुबा दी थी। 2020 में कांग्रेस के पास 19 सीटें थीं, तब पार्टी 70 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। इस बार कांग्रेस ने 61 उम्‍मीदवारों को मैदान में उतारा और वह महज 1 सीट पर ही बढ़त मिलती दिख रही है। ऐसे में तेजस्वी का कांग्रेस पर ज्यादा भरोसा करना सही साबित होता नहीं दिख रहा है।

इस बार दोनों चरणों में पुरुषों की तुलना में कम से कम 4,34,000 अधिक महिलाओं ने मतदान किया है। प्रतिशत के हिसाब से महिलाओं का मतदान प्रतिशत 71.6% रहा, जबकि पुरुषों का 62.8% रहा। यानी कुल मिलाकर पुरुषों के मुकाबले महिलाओं ने 10 फीसदी ज्यादा मतदान किया। ये वही महिलाएं हैं, जिनमें जीविका दीदियां भी शामिल हैं, जिनके खाते में 10 हजार रुपये आए हैं। इस बार मुख्यमंत्री रोजगार योजना के तहत महिलाओं के खाते में 10-10 हजार रुपये आए थे। इससे वे रोजगार करने को प्रोत्साहित हुईं। शराबबंदी करना भी नीतीश कुमार के लिए बड़ा दांव रहा, जिससे वे महिलाओं के चहेते बनते गए। वहीं, आरजेडी काला इतिहास सबको पता है। बिहार में कोई नहीं चाहता था कि फिर से जंगलराज कायम हो।

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