बिहार चुनाव में महागठबंधन की अंदरूनी कलह अब खुलकर सामने आ गई है।नामांकन वापस लेने की अंतिम तारीख नजदीक आने के बावजूद, महागठबंधन के घटक दलों में समझौता नहीं हो सका है।स्थिति यह है कि राज्य की कम से कम 11 विधानसभा सीटों पर आरजेडी, कांग्रेस, सीपीआई और वीआईपी उम्मीदवार एक-दूसरे के खिलाफ मैदान में उतर गए हैं। इस असहज स्थिति के पीछे सियासी गलियारों में कांग्रेस के युवा नेता और स्टार प्रचारक कन्हैया कुमार और पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव की भूमिका को अहम माना जा रहा है।क्योंकि दोनों नेताओं के राहुल गांधी ही नहीं, कांग्रेस के कई और बड़े नेताओं से अच्छे संबंध हैं।लेकिन हाल के महीनों में दोनों नेताओं के साथ हुए व्यवहार के बाद मामला पूरा पलट गया है। पप्पू यादव तो टीवी चैनल पर आकर आरजेडी को खूब कोस रहे हैं।ऐसे में सियासी गलियारे में चर्चा शुरू होने लगी है कि जिस तरह से लोकसभा चुनाव में पप्पू यादव के साथ पूर्णिया और कन्हैया कुमार के साथ बेगूसराय में तेजस्वी ने खेल किया था, कुछ वैसा ही खेल इस बार बिहार चुनाव में तेजस्वी के साथ हो सकता है।
बीते लोकसभा चुनाव में कांग्रेस तेजस्वी यादव से बेगूसराय सीट कन्हैया कुमार के लिए मांग रही थी। लेकिन आरजेडी ने कन्हैया कुमार को न देकर यह सीट सीपीआई को दे दी थी। इसी तरह पप्पू यादव भी कांग्रेस की टिकट पर पूर्णिया से लड़ना चाहते थे।लेकिन तेजस्वी ने यह सीट कांग्रेस को न देकर जेडीयू से आई बीमा भारती को दे दी थी। हालांकि, इसके बावजूद पप्पू यादव ने यह सीट जीत ली।लेकिन विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को ज्यादा से ज्यादा सीटों की मांग कर तेजस्वी यादव का पूरा गणित बिगाड़ दिया।तेजस्वी के इस रुख से दोनों युवा नेताओं को बड़ा झटका लगा था।माना जा रहा है कि तेजस्वी यादव द्वारा इन नेताओं को लगातार हल्के में लेने का नतीजा अब विधानसभा चुनाव में सामने आ रहा है क्योंकि, दोनों नेता राहुल गांधी के साथ-साथ कांग्रेस के काफी करीबी हैं।
दूसरे चरण के नामांकन वापस लेने की अंतिम तिथि 23 अक्टूबर से पहले भी गठबंधन में गहरा मतभेद बना हुआ है। सूत्रों के अनुसार, कम से कम 11 सीटों पर गठबंधन के उम्मीदवार आमने-सामने हैं।5 सीटों पर आरजेडी बनाम कांग्रेस की टक्कर नजर आ रही है।वैशाली, सिकंदरा, कहलगांव और सुल्तानगंज में भी टक्कर देखी गई है।4 सीटों पर सीपीआई और कांग्रेस के उम्मीदवार भी आपस में लड़ रहे हैं, जो लेफ्ट और कांग्रेस के बीच तालमेल की कमी को दर्शाता है। दो सीटों पर वीआईपी और आरजेडी के प्रत्याशी भी टक्कर में हैं।
नामांकन वापसी की अंतिम तिथि तक महागठबंधन को कुछ राहत मिली है।लालगंज सीट से कांग्रेस प्रत्याशी आदित्य कुमार राजा ने अपना नामांकन वापस ले लिया है, जिससे वहां आरजेडी के लिए रास्ता साफ हुआ है।हालांकि, अभी भी लगभग 9 से 11 सीटों पर पेंच फंसा हुआ है।इन सीटों पर कई उम्मीदवारों को दबाव बनाकर नामांकन वापस लेने के लिए मनाया जा रहा है।माना जा रहा है कि जहां पप्पू यादव और कन्हैया कुमार का प्रभाव है, वहां कांग्रेस नेताओं ने जानबूझकर कड़ा रुख अपनाया है, ताकि आरजेडी पर दबाव बनाया जा सके और भविष्य की राजनीति में कांग्रेस का दांव मजबूत हो सके।
महागठबंधन की इस अंदरूनी राजनीति का सबसे बड़ा प्रभाव यह होगा कि इन टकराव वाली सीटों पर गठबंधन का वोट पूरी तरह से बंट जाएगा।कांग्रेस और आरजेडी की सीधी लड़ाई के चलते, इन सीटों पर एनडीए के प्रत्याशी के लिए जीत आसान हो जाएगी। यह विवाद सिर्फ सीट बंटवारे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महागठबंधन की एकजुटता पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। अगर चुनाव से पहले यह बिखराव नहीं थमता है, तो तेजस्वी यादव का ‘युवा नेता’ और ‘बदलाव’ का नैरेटिव कमजोर पड़ सकता है, क्योंकि मतदाता हमेशा एक स्थिर और एकजुट विकल्प की तलाश में रहते हैं।पप्पू यादव और कन्हैया कुमार जैसे नेताओं को दरकिनार करना अब तेजस्वी के लिए चुनावी सिरदर्द बन चुका है।
