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सावन में भगवान शिव शंकर की विशेष पूजा आराधना किए जाने के कारण

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सावन का महीना कल से शुरू होने जा रहा है। वैसे तो हर महीने हर दिन भगवान शिव शंकर की पूजा की जाती है, लेकिन सावन के महीने में भगवान शिव शंकर की विशेष रूप से पूजा आराधना की जाती है। देश के द्वादश ज्योतिर्लिंगों के साथ साथ देश के सभी ग्रामीण और शहरी शिवालयों में जाकर इस समय भगवान शिव शंकर की पूजा आराधना करते हैं,जय जगहों पर कावड़ यात्राएं की जाती है। आईए जानते हैं सावन के महीने में भगवान शिव शंकर की विशेष पूजा होने के कारणों के बारे में।

जब ना हवा थी,न पानी या आग था, , ना दिशाएं थी और ना ही कोई ग्रह नक्षत्र और तारा ही था। चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ अंधकार का सम्राज्य था। ऐसे में आदि मध्य और अवसान सभी में समाहित रहने वाले भगवान शिव शंकर,के मन में सृष्टि के नवसंचार की संकल्पना ने जन्म लिया। तब उन्होंने हर एक चीज का निर्माण करना प्रारंभ किया।उन्होंने खुद को तीन रूपों ब्रह्मा विष्णु और रुद्रा के रूप में प्रतिस्थापित कर उन्हें क्रमशः सृष्टि निर्माण, सृष्टि पालन और सृष्टि के संहार का कार्य सौंप दिया। इस रूप में ब्रह्मा सृष्टि निर्माण ,विष्णु सृष्टि पालन और सृष्टि के संघट का कार्य कर रहे थे। इस बीच कतिपय कारणों से ,भगवान विष्णु को प्रत्येक वर्ष 4 महीने के लिए जिन्हें हम चातुर्मास कहते हैं ,योग निद्रा में जाना अनिवार्य हो गया।उनके योग निद्रा में जाने की चर्चा में उपयुक्त अवसरों पर आप सबके साथ करूंगा।लेकिन
भगवान विष्णु के प्रत्येक वर्ष इस प्रकार से योग निद्रा में चले जाने से भगवान शिव शंकर के द्वारा सृजित सृष्टि के संचालन की प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न होने की संभावना दिखने लगी। ब्रह्म देव के द्वारा सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया जारी रहे लेकिन इस सृष्टि का पालन नहीं हो तो सृष्टि के असमय अवसान होने की एक बड़ी समस्या खड़ी हो गई।तब भगवान शिव शंकर ने खुद अपने ही ऊपर यह भार ले लिया । इसके बाद प्रत्येक वर्ष जब भगवान विष्णु देवशयनी एकादशी के दिन योग निद्रा में चले जाने की स्थिति में यह भार खुद अपने ऊपर ले लिया।अवसर के अनुकूल वे अपने द्वारा प्रतिनियुक्ति देवताओं और देवियों की मदद से भी सृष्टि के पालन की जिम्मेवारी तबतक निभाते हैं, जब तक की देवोत्थान एकादशी के दिन भगवान विष्णु पुनर जागृत होकर सृष्टि पालन की पूरी जिम्मेवारी अपने ऊपर ले नहीं लेते हैं। सावन के महीने में सृष्टि पालन की पूरी जिम्मेवारी भगवान शिव शंकर ने अपने ही ऊपर ले रखा है। यही कारण है की वर्ष के अन्य महीना की तुलना में सावन महीने में भगवान शिव शंकर की विशेष पूजा आराधना की जाती है।
इसके अलावा सावन के महीने में भगवान शिव शंकर के विशेष पूजा को लेकर कुछ अन्य कथाए भी प्रचलित हैं।

इन प्रचलित कथाओं में से एक कथा देवताओं और दानवों के द्वारा मिलकर समुद्र मंथन से जुड़ी हुई है समुद्र मंथन के क्रम में जब सबसे पहले विष निकला तो समस्त सृष्टि त्राहिमाम त्राहिमाम करने लगी ।तब भगवान शिव शंकर ने उस हलाहल विष को पान कर उसे कंठ में अटका लिया।इससे उनका कंठ नीला पड़ गया। समुद्र मंथन के क्रम में विष की उत्पत्ति और भगवान शिवशंकर के द्वारा विष पान का समय सावन का था, इसलिए भक्त सावन के महीने में भगवान शिव शंकर की पूजा कर उन्हें विशेष रूप से जलार्पण करते हैं ताकि विष का प्रभाव कम हो और भगवान शिवशंकर की इनपर विशेष कृपा हो।

इस कथा के अलावा एक अन्य कथा पार्वती के द्वारा भगवान शिव शंकर को वर रूप में प्राप्त करने के लिए की जाने वाली तपस्या से भी जुड़ा हुआ है ।इस कथा के अनुसार जब नारद ने पार्वती के पिता हिमवान के कहने पर माता पार्वती का भाग्य बांचा तो उन्होंने कहा कि पार्वती का विवाह एक ऐसे वर से होने का संकेत है जिसके कुल का कोई पता नहीं, जो श्मशानवासी और भिक्षुक होगा। फिर उन्होंने इसके समाधान के स्वरूप में बताया कि यह सारे दोष भगवान शिव शंकर में समाहित होकर गुनातीत हो जाते हैं। ऐसे में अगर माता पार्वती तपकर भगवान शिव शंकर को अपना बनाने में सक्षम हो जाती है तो,इनके ये सारे दोष गुण में बदल जाएगा। माना जाता है कि जब पार्वती ने भगवान शिव शंकर को वर रूप में प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या प्रारंभ की थी तब वह महीना भी सावन का ही महीना था ।

सबसे बढ़कर भगवान शिव शंकर औघरदानी हैं,अपने भक्तों पर तुरत ढर जाते हैं और लोगों की हर प्रकार की मनोकामनाओं को पूर्ण कर देते हैं ।कहां भी गया है दुराराध्य पर अहहिं महेसु, आशुतोष पुनि किये क्लेषु।आईए मेरे साथ आप सब भी भगवान शिव शंकर की जयकारा लगाएं ।हर हर महादेव।

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