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चंद्रबाबू नायडू ने की जातीय गणना की वकालत ,खतरे में पड़ सकती है मोदी सरकार  !

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अखिलेश अखिल 
हरियाणा और जम्मू कश्मीर चुनाव के परिणाम के बीच मोदी सरकार की सहयोगी पार्टी टीडीपी के मुखिया और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने जातीय गणना की जरुरी बताया है। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा है कि  ”जातीय गणना जरूर होनी चाहिए। इसको लेकर समाज में एक सेंटीमेंट है और कुछ भी गलत नहीं है। जब आप जातीय गणना करते हैं तो आप आर्थिक विश्लेषण करते हैं और आप कौशल गणना भी करते हैं। ” 

नायडू के इस बयान के बाद बीजेपी की परेशानी बढ़ सकती है। बता दें कि मौजूदा मोदी की सरकार नायडू और नीतीश कुमार के सहयोग से चल रही है। नीतीश कुमार जातीय गणना के हिमायती रहे हैं और उन्होंने बिहार में जातीय सर्वे भी करा लिया है। उसके डाटा भी सार्वजनिक हो चुके हैं। अब अगर चन्द्रबाबू नायडू जातीय गणना की मांग को आगे बढ़ाते हैं तो विपक्षी दलों को और भी मजबूती मिल सकती है। कांग्रेस समेत सभी विपक्षी पार्टियां जातीय गणना की मांग को लेकर मोदी सरकार पर लगातार हमलावर रहे हैं। 

एक अंग्रेजी अखबारको दिए साक्षात्कार में  चंद्रबाबू नायडू ने कहा कि ऐसा करना इसलिए जरूरी होता है ताकि नीतियों और अन्य चीजों को ऐसे बनाया जाए जिससे आर्थिक असमानताएं कम की जा सकें। चंद्रबाबू नायडू ने कहा कि जाति जनगणना की मांग की भावना का सम्मान करना होगा और इसमें कोई दो राय नहीं है। उन्होंने कहा कि ‘गरीबी सबसे बड़ा मुद्दा है, भले ही आप कमजोर वर्ग से ताल्लुक रखते हों लेकिन अगर आपके पास पैसा है तो समाज आपकी इज्जत करेगा। अगर आप ऊंची जाति से हैं और आपके पास पैसा नहीं है तो कोई भी आपकी इज्जत नहीं करेगा।‘

बता दें कि चंद्रबाबू  नायडू की पार्टी टीडीपी ने इस साल लोकसभा के साथ ही हुए विधानसभा चुनाव में आंध्र प्रदेश में बड़ी जीत हासिल की है। उन्होंने बीजेपी और अभिनेता से राजनेता बने पवन कल्याण की पार्टी जनसेना पार्टी के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा था। 

175 सीटों वाली विधानसभा में इस गठबंधन ने 164 सीटें हासिल कीं। इसमें से टीडीपी को 135, जनसेना पार्टी को 21 और बीजेपी को 8 सीटों पर जीत मिली थी। वहीं 2019 में राज्य में सरकार बनाने वाली वाईएसआर कांग्रेस पार्टी को सिर्फ 11 विधानसभा सीटें ही मिली थी। इसी तरह 25 लोकसभा सीटों वाले आंध्र प्रदेश में इस गठबंधन ने 21 सीटें हासिल कीं। इनमें से टीडीपी को 16, बीजेपी को तीन और जनसेना पार्टी को दो सीटें मिली थीं।

चंद्रबाबू नायडू इससे पहले भी बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए का हिस्सा रहे हैं और वाजपेयी दौर में वे एनडीए के संयोजक हुआ करते थे। लेकिन कुछ वर्ष पहले उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधे हमले बोलते हुए एनडीए का साथ छोड़ दिया था। लेकिन इस बार विधानसभा और लोकसभा चुनाव से उन्होंने एनडीए में वापसी की है।

गौरतलब है कि बीते कुछ महीनों के दौरान बीजेपी के सहयोगी दल लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने भी जाति जनगणना का समर्थन किया है। उधर उत्तर प्रदेश में बीजेपी के सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) की प्रमुख और केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल ने भी कई बार जाति जनगणना का मुद्दा खुलकर उठाया है। बिहार में बीजेपी के साथ मिलकर सरकार चला रही और एनडीए की पुरानी सहयोगी जेडीयू ने पिछले साल ही बिहार में जाति सर्वेक्षण करवाया था। केंद्र सरकार में शामिल जेडीयू भी जाति जनगणना का समर्थन कर चुका है।

यहां रोचक है कि जाति जनगणना पर सीधे तौर पर बोलने से बचता रहा आरएसएस भी जाति जनगणना के समर्थन में सामने आ गया है। संघ की तरफ से अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा था कि जाति जनगणना एक संवेदनशील मुद्दा है और इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा था कि पिछड़े समुदायों के कल्याण के लिए अगर सरकार को आंकड़ों की जरूरत होती है तो जाति जनगणना एक अच्छा अभ्यास हो सकता है। उनके बयान से माना गया कि संघ भी जाति जनगणना के पक्ष में है।

ध्यान देने की बात है कि मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में अन्य पिछड़ा वर्ग  जातियों के उप वर्गीकरण यानी सब क्लासिफिकेशन को लेकर रोहिणी आयोग बनाया था। इस आयोग के एक सदस्य जीके बजाज ने पिछले दिनों जाति जनगणना का समर्थन किया था।

बजाज ने कहा था कि जाति जनगणना करने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि एक बार जब आपको जाति का पता चल जाता है तो बाकी आंकड़े भी इसके साथ जुड़ जाते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया था कि यह सिर्फ जाति गणना नहीं बल्कि जनगणना होनी चाहिए क्योंकि इससे सामाजिक-आर्थिक आंकड़े सामने आते हैं।

इतना सब होने के बाद भी यह सवाल बना हुआ है कि आखिर बीजेपी जाति जनगणना को लेकर ठोस कदम क्यों नहीं उठा रही है। वैसे बीजेपी ने जाति जनगणना का विरोध तो नहीं किया है लेकिन वह इस पर आगे बढ़ती भी नहीं दिखाई देती है।

बता दें कि जनगणना के आंकड़ें काफी महत्वपूर्ण होते हैं और इनका व्यापक असर होता है। खाद्य सुरक्षा, राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम और निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन जैसी कई योजनाएं इन्ही आंकड़ों पर निर्भर होती हैं। इन आंकड़ों का इस्तेमाल सरकार के अलावा उद्योग जगत और रिसर्च इंस्टीट्यूट भी करते हैं।

आंकड़ों के लिए बता दें कि लोकसभा में बीजेपी के पास 240 सीटें है जो बहुमत के आंकड़े 272 से 32 सीटें कम हैं। इसीलिए उसे टीडीपी के 16 और जेडीयू के 12 सांसदों के साथ ही एलजेपी और अपना दल जैसे दलों का समर्थन लेना पड़ा है।

हाल के दिनों में देखा गया है कि कई मुद्दों पर बीजेपी को अपने फैसले बदलने पड़े हैं जब इन्हीं सहयोगी दलों ने उन पर आपत्ति जताई है। बजट में इंडेक्सेशन का मुद्दा हो या वक्फ बिल। इन मुद्दों पर बीजेपी को बैकफुट पर आकर रोलबैक करना पड़ा है। अब देखना होगा कि बीजेपी जाति जनगणना के मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है।

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