रांची (बीरेंद्र कुमार): सोहराय आदिवासियों के सबसे बड़े समूह संथलों का महापर्व है। इस पर्व को लेकर संथाल समुदाय के लोगों में हर्ष और उत्साह का माहौल देखा जाता है।संथाल चाहे दुनिया में कहीं भी रहे,लेकिन इस पर्व के समय इसे मानने अपने गांव ज़रूर लौट आते हैं।
5 दिनों तक चलता है यह पर्व
5 दिनों तक चलने वाले सोहराय पर्व के दौरान जनवरी के महीने में तिलसंक्रांति तक संतालों की बस्तियों में जगह जगह पर आपको बांसुरी की स्वर लहरियां सुनाई पड़ेगी और मांदर के थाप पर थिरकते संताल स्त्री और पुरुषों की टोलियों के दर्शन हो जायेंगे। भाई बहन के प्रेम के साथ,पशुओं और प्रकृति से प्रेम करने का अमर संदेश देता है यह महापर्व सोहराय। जनवरी के महीने में तिला संक्रांति तक अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग दिनों में मनाया जाने वाले इस सोहराय पर्व की यह खासियत है कि यह पर्व व्यक्तिगत स्तर पर नहीं बल्कि सामूहिक रूप से मनाया जाता है।
सोहराय पर्व के पहले दिन जिस गांव में उसे मनाया जाता है,उस गांव के लोग अपने अपने घरों से चावल और मुर्गी का बच्चा लेकर जाहेर थान यानि पूजा स्थल में जाते है। यहां नयकी यानि पूजारी सबसे पहले मरांग बुरु यानी महादेव की पूजा करते हैं। इसके उसके सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता है। सामूहिक भोज के बाद बंसी की धुन और मांदर की थाप पर आदिवासी पुरुष और स्त्रियां नृत्य और संगीत मैं मस्त होकर घंटों थिरकते रहते हैं। दूसरे दिन ये अपने खेतों में खेती में काम आने वाले उपकरणों जैसे हल,कुदाल आदि की पूजा करते हैं। तीसरे दिन ये बैल और अपने पशुओं की विशेष पूजा करते है। चौथे दिन ये सामूहिक रूप से शिकार जिसे सेनरा कहा जाता है पर निकलते हैं।और 5वें दिन ये अरंड का पेड़ के पास तीरंदाजी करते हैं।
सोहराय के संदेश आज भी प्रासंगिक
आदिवासियों का सबसे बड़ा पर्व सोहराय प्रकृति पूजा और आपसी प्रेम और सद्भाव का पर्व है। आज इस पर्व की भावना को समझने की बड़ी जरूरत है, क्योंकि प्रकृति की छेड़छाड़ करने का दुष्परिणाम मनुष्यों को इस समय मिलने लगा है। कभी अनावृष्टि तो कभी अतिवृष्टि के रूप में और हाल में आए कोरोना भी कहीं न कहीं प्राकृतिक छेड़छाड़ से जुड़ा हुआ है। एकाकी होते जा रहे समाज को यह सामूहिकता का भी एक बड़ा पाठ पढ़ाता है।

