बीजेपी की अगुवाई वाला एनडीए गठबंधन चुनाव पूर्व से ही इस फिराक में था कि 2024 का लोकसभा चुनाव में विपक्ष का नेतृत्व राहुल गांधी संभाले तो इसके लिए जीत की राह थोड़ी आसान हो जाएगी ,वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस भी देश की सबसे पुरानी पार्टी होने के कारण एनडीए के विरोध वाली पार्टियों का नेतृत्व खुद करना चाह रही थी ताकि एनडीए को कड़ी टक्कर दी जा सके।बीजेपी और कांग्रेस दोनों अपने-अपने इस मंसूबे में कामयाब तो होते हुए जरूर दिखते हैं, लेकिन इसके अलावे लगभग उत्तर से लेकर दक्षिण तक आठ दल ऐसे हैं जो क्षेत्रीय होते हुए भी अगर इनकी चल गई तो ये इन दोनों गठबंधनों एनडीए और इंडिया एलायंस के सपनों पर आगामी आम चुनाव में पानी फेर सकते हैं ।
एनडीए और इंडिया दोनों गठबंधन को सता रहा है इन क्षेत्रीय दलों का डर
इन आठ क्षेत्रीय पार्टियों ने अकेले ही बीजेपी और कांग्रेस के नेतृत्व वाली एनडीए और इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।कहा जा रहा है कि ये पार्टियां अगर बेहतरीन परफॉर्मेंस करने में कामयाब होती हैं, तो कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही के गठबंधन का खेल खराब हो सकता है। एनडीए और इंडिया दोनों गठबंधन को इसका डर भी सता रहा है, इसलिए बीजेपी और कांग्रेस इन पार्टियों के दबदबे वाले क्षेत्रों में अपनी अलग से रणनीति तैयार कर रही हैं। मसलन, उम्मीदवारों का चयन इन्हीं पार्टियों के वोटबैंक को ध्यान में रखकर किया जा रहा है, जिससे इनका कम से कम डैमेज हो सके।
अपने कैंपेन में भी इन पार्टियों पर सीधे-सीधे हमला करने से बच रहे एनडीए और इंडिया के बड़े- बड़े नेता
वोट प्रतिशत के लिहाज से देशभर में इन क्षेत्रीय पार्टियों का वोट प्रतिशत भले ही15 प्रतिशत के आसपास हो, लेकिन लोकसभा की करीब 230 सीटें ऐसी हैं, जहां इनका दबदबा काफी ज्यादा है और ये चुनाव को त्रिकोणीय बनाने में सक्षम हैं।चुनाव को त्रिकोणीय बनाकर ये वहां की जीत- हार तय कर सकती हैं ।अलग -अलग राज्यों और क्षेत्रों में है इनका दबदबा।
1. अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके)
अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम तमिलनाडु की क्षेत्रीय पार्टी है। वर्तमान में यह पार्टी तमिलनाडु विधानसभा में मुख्य विपक्ष की भूमिका में है।इस पार्टी का सीधा असर तमिलनाडु की 39 और पुडुचेरी की एक सीट पर है।चुनाव की घोषणा से कुछ माह पूर्व तक यह बीजेपी के साथ थी, लेकिन द्रविड़ मुद्दे पर इसने एनडीए का साथ छोड़ दिया और पार्टी ने लोकसभा चुनाव 2024अकेले लड़ने का फैसला किया।
तमिलनाडु में एक तरफ बीजेपी, पीएमके जैसी पार्टियाों का गठबंधन है, तो दूसरी तरफ डीएमके और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ रही है। हालांकि, कहा जा रहा है कि दोनों में किसे बढ़त मिलेगी, यह एआईएडीएमके के परफॉर्मेंस पर निर्भर करेगा।
2. वाईएसआर कांग्रेस
आंध्र प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी वाईएसआर कांग्रेस भी इस चुनाव में अकेले लड़ रही है।आंध्र प्रदेश में लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा का चुनाव भी प्रस्तावित है। आंध्र प्रदेश में लोकसभा की कुल 25 सीट है।पिछले चुनाव में वाईएसआर ने एकतरफा जीत दर्ज की थी।हालांकि, इस बार पार्टी की राह आसान नहीं है।
आंध्र प्रदेश में एक तरफ बीजेपी और टीडीपी का गठजोड़ है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस भी मजबूती से लड़ रही है।आंध्र का रिजल्ट क्या होगा, वो भी बहुत कुछ वाईएसआर के परफॉर्मेंस पर ही निर्भर करेगा।
3. वंचित बहुजन अघाड़ी
भीमराव अंबेडकर के पोते प्रकाश अंबेडकर वंचित बहुजन अघाड़ी पार्टी का संचालन करते हैं.।2019 के लोकसभा चुनाव में अंबेडकर की पार्टी को 6.92 प्रतिशत वोट मिला था। वंचित बहुजन अघाड़ी कुछ दिन पहले तक इंडिया गठबंधन में शामिल थी, लेकिन सीटों पर बात नहीं बनने की वजह से प्रकाश अंबेडकर ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है।
बहुजन अघाड़ी का महाराष्ट्र की करीब 12 सीटों पर सीधा असर है।पिछले चुनाव में अकोला सीट पर प्रकाश अंबेडकर दूसरे नंबर पर रहे थे.प्रकाशअंबेडकर के अकेले चुनाव लड़ने को लेकर कांग्रेस ने इसपर निशाना साधा है।कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले ने कहा है कि अंबेडकर बीजेपी के इशारे पर काम कर रहे हैं और महायुति का खेल बिगाड़ने की कोशिश में लगे हैं।
4. बहुजन समाज पार्टी
मायावती की बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की 84 लोकसभा सीटों पर मजबूत स्थिति में है। मायावती 2019 में एसपी के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ी थी, लेकिन इस बार पार्टी अकेले लड़ रही है।
2014 में भी बीएसपी अकेले चुनाव लड़ी थी और करीब 70 सीटों पर इसने सपा का खेल खराब की थी।
एसपी इस बार कांग्रेस के साथ गठबंधन में है, लेकिन पश्चिमी यूपी और बुंदेलखंड की सीटों पर उसे बीएसपी का डर अब भी सता रहा है। वहीं बीएसपी ने इस बार बीजेपी के खिलाफ भी कई सीटों पर मजबूत उम्मीदवार उतारे हैं।बीएसपी मध्य प्रदेश की ग्वालियर-चंबल में भी मजबूत स्थिति में है। बीएसपी अगर यहां बढ़िया परफॉर्मेंस करती है, तो कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
5. केसीआर की बीआरएस पार्टी
तेलंगाना की मुख्य विपक्षी पार्टी बीआरएस इस बार अकेले चुनाव लड़ रही है।तेलंगाना में लोकसभा की कुल 17 सीटें हैं, जिसमें से बीआरएस ने पिछली बार 9 सीटों पर जीत हासिल की थी।तेलंगाना में बीजेपी और कांग्रेस 2019 के मुकाबले ज्यादा मजबूत हुई है, लेकिन बीआरएस भी कई सीटों पर खेल खराब कर सकती है। हाल ही में हुए तेलंगाना के विधानसभा चुनाव में बीआरएस को 37 प्रतिशत वोट मिले थे, जो सत्ताधारी कांग्रेस से सिर्फ 2 प्रतिशत ही कम था। तेलंगाना के शहरी इलाकों में केसीआर की पार्टी का अभी भी दबदबा है।
6. तृणमूल कांग्रेस
पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस भी इस बार अकेले ही चुनावी मैदान में है। बंगाल में लोकसभा की कुल 42 सीटे हैं।पहले ममता के सीपीएम और कांग्रेस से गठबंधन की बात कही जा रही थी, लेकिन आखिर वक्त में ममता ने एकला चलो का राह अख्तियार कर लिया।
ममता ने कांग्रेस और बीजेपी दोनों के खिलाफ मजबूत मोर्चेबंदी की है।कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन के खिलाफ ममता ने क्रिकेटर यूसुफ पठान को मैदान में उतारा है, तो वहीं बीजेपी के मजबूत गढ़ तमलुक से युवा चेहरे देबांग्शु भट्टाचार्य को उम्मीदवार बनाया है।2019 में बंगाल में बीजेपी को 18, कांग्रेस को 2 और ममता की पार्टी को 22 सीटों पर जीत मिली थी।
7. इंडियन नेशनल लोकदल और जननायक जनता पार्टी (इनेलो और जेजेपी)
हरियाणा में वैसे तो मुख्य मुकाबला बीजेपी और कांग्रेस गठबंधन के बीच है, लेकिन सबकी नजर इनेलो और जेजेपी जैसी क्षेत्रीय पार्टियों पर भी है। दोनों पार्टियां इस बार अकेले चुनाव लड़ रही है।जाटलैंड में इन दोनों क्षेत्रीय दलों का मजबूत पकड़ रहा है। जेजेपी हाल तक एनडीए गठबंधन में शामिल था। हरियाणा में लोकसभा की कुल 10 सीटें हैं और 2019 में यहां का सभी सीटों पर बीजेपी को जीत मिली थी।
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