बीरेंद्र कुमार झा
भारतीय स्पेस एजेंसी( ISRO)का बनाया चंद्रयान-3 इस वक्त चांद के दक्षिणी ध्रुव पर मजबूती से खड़ा है।लैंडिंग की शुरुआती 14 दिन तो यान का विक्रम लैंडर और रोवर पूरी ताकत के साथ चांद पर खोजबीन में जुटे रहे, लेकिन रात के बाद अब जब सवेरा हो चुका है, विक्रम और रोवर निष्क्रीय पड़े हुए हैं। इसरो के वैज्ञानिकों का दावा है कि उनकी कोशिश अंधेरा होने तक जारी रहेगी आशंका है कि रोवर के उपकरण रात की – 200 डिग्री वाली ठंड में काम करना बंद कर चुकी है। पूरी दुनिया इस वक्त विक्रम और रोवर के जगने का इंतजार कर रही है, ताकि वह एक बार फिर चांद पर घूमकर जीवन की तलाश में नई खोज करते रहे। अब ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या यान के साथ भट्टी साथ भेजी जाती तो विक्रम और रोवर जाग जाते! इससे पहला नासा और रुसी एजेंसी एजेंसी रोस्कोशमोस भी इसका इस्तेमाल कर चुके हैं।
22 सितंबर को चांद पर सूर्योदय के बाद से इसरो की टीम लगातार विक्रम और रोवर को जगाने की कोशिश कर रही है, लेकिन समय के साथ रोवर के फिर से सक्रिय होने की उम्मीद धूमिल होती चली जा रही है। सवाल यह है कि क्या अगर भट्टी को यान के साथ भेजा जाता तो लैंडर विक्रम और प्रज्ञान रोवर काम करने लगता! हम जिस भट्टी की बात कर रहे हैं उसे रेडियो आइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जेनरेटर या (RTG)कहते हैं।
क्या है आरटीजी और यह कैसे करता है काम
रेडियाइसोटोप हीटर यूनिट एक छोटा उपकरण होता है,जिसे अंतरिक्ष यान के अंदर फिट करके मिशन में भेजा जाता है। यह रेडियोधर्मी उपकरण अंतरिक्ष में उपकरणों को गर्मी देता है। यह छोटे रेडियो आइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जेनरेटर के समान है ।इसके एक उपकरण से कई दशकों तक उपकरण को गर्मी दी जा सकती है। इसके 1 किलो प्लूटोनियम से 80 लाख किलोवाट बिजली पैदा की जा सकती है। आरटीजी में कोई चलायमान हिस्सा नहीं होता, इसलिए इसमें सर्विसिंग की जरूरत नहीं होती है।
अंतरिक्ष यान में आरएचयू का उपयोग अंतरिक्ष या किसी और ग्रह या उपग्रह पर उपकरण को गर्मी देने के लिए किया जाता है।जहां यह होता है वहां का तापमान अंतरिक्ष यान के अन्य हिस्सों के तापमान से बहुत भिन्न हो सकता है अंतरिक्ष के वातावरण में यान का कोई भी हिस्सा जिस पर सीधी धूप नहीं पड़ती है ,वह इतना ठंडा हो जाता है कि इलेक्ट्रॉनिक्स या नाजुक वैज्ञानिक उपकरणों के टूटने का खतरा हो जाता है तभी इलेक्ट्रिक हीटर उन्हें गर्म रखने के अन्य तरीकों की तुलना में सरल और अधिक विश्वसनीय माने जाते हैं।
नासा रूस और चीन भी कर चुके हैं इस्तेमाल
रेडियाइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जेनरेटर यानी आरटीजी वह उपकरण है जिसका इस्तेमाल अमेरिका की नासा और रूस की अंतरिक्ष एजेंसी कई बार कर चुकी है।अमेरिकी अंतरिक्ष मिशनों पर उपयोग किए जाने वाले रेडियो आइसोटप थर्मोइलेक्ट्रिक जेनरेटर का एक विशिष्ट डिजाइन है।नासा जीपीएचएस- आरटीजी का इस्तेमाल युलिसिस 1 गैलीलियो 2 जैसे मिशनों में कर चुका है।
रूस की रूस की अंतरिक्ष एजेंसी 17 नवंबर 1970 को चांद पर रोवर उतारने वाला पहला देश बना था। लूना 1 नाम के अंतरिक्ष यान ने 10 महीने में चांद की सतह पर 10 किलोमीटर की यात्रा तय की। चांद पर क्योंकि धरती के 14 दिनों के बराबर रात होती है और इस दौरान चांद का तापमान – 200 डिग्री तक चला जाता है। ऐसे में रात के वक्त उपकरणों के खराब होने का खतरा रहता है। ऐसे में रूस ने पोलोनियम रेडियो आइसोटोप हीटर की मदद से रोवर को गर्म रखा। चीन ने भी 2013 में चंगाई 3 लैंडर और यूतु रोवर भेजा था,उसमें भी हीटर डिवाइस लगाई थी।

