बीरेंद्र कुमार झा
बिहार में जाति जनगणना के आंकड़े जारी हो चुके हैं। यह बात पुख्ता तौर पर उभरकर सामने आ चुकी है कि बिहार में सबसे ज्यादा संख्या यादवों की है। उसकी हिस्सेदारी 14.27 प्रतिशत है। इस जाति का सियासी झुकाव आरजेडी की तरफ रहा है।वही गठबंधन सरकार के दूसरे सबसे बड़े दल जेडीयू के नेता और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जाति कुर्मी की आबादी मात्र 2.58 प्रतिशत है। नीतीश कुशवाहा वोटरों में भी सेंधमारी करते रहे और कभी लव- कुश समीकरण के एक क्षत्र सेनानी रहे हैं।नए सर्वे के मुताबिक कोयरी कुशवाहा की आबादी 4.21 प्रतिशत है।
अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC ) सबसे बड़ा जाति समूह
जाति जनगणना में जो सबसे बड़ी बात उभरकर सामने आई है, वह यह कि अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC ) कैटेगरी सबसे बड़ी आबादी वाला समूह है। आंकड़ों के मुताबिक समाज में उनकी हिस्सेदारी 36.01% है, जबकि पिछड़ा वर्ग जिसमें यादव और कोयरी- कुर्मी भी शामिल है, उसकी आबादी 27.12% है। केंद्र सरकार की नौकरियों में ओबीसी कैटेगरी के कोटे पर अधिकांश कब्जा इन्हीं तीन जातियों का होता है। ऐसे में अब यह मांग उठ सकती है कि ओबीसी कैटेगरी को मिलने वाले आरक्षण में कोटे के अंदर कोटा लागू किया जाए।केंद्र सरकार ने इसी के लिए जस्टिस रोहिणी कमीशन का गठन किया था।इसकी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंप जा चुकी है।
अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC ) राजनीतिक संगठन और चुनाव के उम्मीदवारी में मांग सकती है बढ़ी हिस्सेदारी
दूसरी तरफ ईबीसी जातियां जिनकी संख्याबल की हिस्सेदारी का पहली बार पता चला है,वह सियासी पहचान में प्रतिनिधित्व के लिए आवाज उठा सकता है। हालांकि ईबीसी कैटेगरी का विभाजन सबसे पहले 1978 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने किया था,लेकिन उनकी सरकार खत्म होते ही उनका कोटा सिस्टम भी ध्वस्त हो गया था। उसके करीब तीन दशक बाद नीतीश कुमार ने इस ईबीसी कैटेगरी को उनका अधिकार दिया और पिछड़ा वर्ग को अत्यंत पिछड़ा वर्ग में विभाजित कर ना सिर्फ उन्हें अलग पहचान दिलाई,बल्कि राज्य सरकार की नौकरियों में उन्हें अलग से आरक्षण भी दिया। इसके बदले में ईबीसी समाज का अधिकांश वोट नीतीश को जाता रहा है।
बिहार में फिलहाल आरक्षण की स्थिति
फिलहाल बिहार में अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC )को 18%,पिछड़ा वर्ग को 12%,अनुसूचित जाति को 16% ,अनुसूचित जनजाति को 1% और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को 10% तथा महिलाओं को 3% आरक्षण दिया जा रहा है। बिहार में अब तक 50% आरक्षण सीमा का उल्लंघन नहीं किया है, लेकिन जाति गणना के नए आंकड़े सार्वजनिक होने के बाद से आरक्षण की आग फिर से भड़क सकती है। इससे निपटना नीतीश सरकार के लिए बड़ी मुश्किल होगी।
2024 के लोक सभा 2025 के बिहार विधान सभा चुनाव पर डाल सकता है असर
अगले साल देशभर न्यू लोकसभा चुनाव होने हैं और उसके बाद 2025 में बिहार विधानसभा का चुनाव भी होने वाला है।जातीय समीकरण और जातीय ध्रुवीकरणों पर आधारित राजनीति में टिकटों का बंटवारा, उम्मीदवारों का चयन और हार – जीत भी जातीय गणित पर ही आधारित होता है। ऐसे में सिर्फ 2 .88% आबादी के नेता के रूप में नीतीश कुमार को झटका लग सकता है, क्योंकि 4.21% वाले कोयरी समाज के वोट बैंक में उपेंद्र कुशवाहा, बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी और आरजेडी के नेता भी सेंधमारी में जुटे हुए हैं।नीतीश कुमार के स्वजातीय कुर्मी वोटो में भी सेंधमारी के लिए उनके ही करीबी रहे आरपी सिंह को भी खड़ा किया गया है।
जेडीयू के सियासी समीकरण पर पड़ सकता है असर
तीसरी बड़ी बात की नीतीश का आधार सिर्फ कोयरी कुर्मी के जाति समीकरण तक ही सीमित नहीं रहा है।वह ईबीसी वोट बैंक के बड़े साधक माने जाते रहे हैं, लेकिन हाल की कुछ वर्षों में इसमें भी बीजेपी ने सेंधमारी की कोशिश की है। अब नए आंकड़ों के बाद ईबीसी कैटेगरी के अंदर से ही आवाज उठ सकती है, जिसका असर जेडीयू के सियासी समीकरणों और सेहत पर पड़ सकता है।
लालू – तेजस्वी के नेतृत्व वाले आरजेडी के बल्ले -बल्ले
लाल यादव और तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाली पार्टी आरजेडी जो यादव और मुस्लिम समीकरण के लिए जानी जाती है,करीब 32 % ( 14.2 7 %यादव और 17.5% मुस्लिम) आबादी का बेस पाकर काफी खुश दिख रही है। हालांकि उसके अन्य जाति वोटो में बिखराव भी देखने को मिल सकता है। वैसे नीतीश को भी कुछ हद तक यादवों और मुसलमानों का वोट मिलता रहा है।लेकिन आरजेडी के उभार के बाद जेडीयू के लिए वह संभावना छीन होती दिख रही है, हालांकि आरजेडी के एक जुट रहने की दशा में यह जाति गणित मास्टर स्ट्रोक के रूप में काम कर सकता है।

