हाई स्कूल शिक्षक नियुक्ति अवमानना मामले में सुप्रीम कोर्ट की झारखंड सरकार को फटकार

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रांची (बीरेंद्र कुमार): सुप्रीम कोर्ट में संयुक्त स्नातक प्रशिक्षित हाई स्कूल शिक्षक प्रतियोगिता परीक्षा- 2016 को लेकर दायर अवमानना याचिका वाले मामले की सुनवाई जस्टिस एम आर शाह व जस्टिस सी टी रवि कुमार की खंडपीठ में चल रही है। इस मामले की सुनवाई के दौरान जब न्यायधीशों ने राज्य सरकार के हलफनामें को देखा तो उस पर मौखिक रूप से तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि हलफनामा देखकर यह लगता है कि इस मामले में झारखंड सरकार ही समस्या पैदा कर रही है। खंडपीठ ने राज्य के मुख्य सचिव सुखदेव सिंह को 2 दिसंबर को होने वाली अगली सुनवाई के दौरान सशरीर उपस्थित रहने का निर्देश दिया है। खंडपीठ ने कहा कि कोर्ट का आदेश बिल्कुल स्पष्ट है,और इसे लागू करने में कोई समस्या नहीं आनी चाहिए। हम बताएंगे कि नियुक्ति कैसे होगी ।

अधिवक्ता रंजीत कुमार और अधिवक्ता ललित कुमार सिंह ने रखा प्रा​र्थियों का पक्ष

इस मामले में खंडपीठ के समक्ष प्रार्थियों की तरफ से वरीय अधिवक्ता रंजीत कुमार और अधिवक्ता ललित कुमार सिंह ने पक्ष रखा। उन्होंने खंडपीठ को बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने एस एल पी में जो आदेश पारित किया था, झारखंड सरकार व जेएसएससी उसका पालन नहीं कर रही है।

सरकार ने पेश की अपनी दलीलें

इस मामले में झारखंड सरकार ने एक हलफनामा दायर कर सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ को बताया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार रिजल्ट प्रकाशित करने पर लगभग 40,हजार लोगों को नियुक्त करना होगा जो विज्ञापन में उल्लिखित सीट संख्या का 3 गुना होगा। इसके अलावा नियुक्त शिक्षकों में से 2136 शिक्षक बाहर हो जाएंगे।

क्या है पूरा मामला?

2016 में जेएसएससी ने संयुक्त स्नातक प्रशिक्षित हाई स्कूल शिक्षक प्रतियोगिता परीक्षा की प्रक्रिया शुरू की थी, जिसके द्वारा 13 अनुसूचित और 11 गैर अनुसूचित जिलों में 17,572 पदों पर शिक्षकों की नियुक्ति की जानी थी। इस मामले में पलामू निवासी सोनी कुमारी व अन्य की ओर से विज्ञापन व नियोजन नीति को चुनौती दी गई। इधर चयन के बाद विभिन्न विषयों में जब 8 हजार से अधिक शिक्षकों की नियुक्ति हो गई तब झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की नियोजन नीति को असंवैधानिक करार दिया तथा 13 अनुसूचित जिलों में की गई शिक्षकों की नियुक्ति रद्द कर दी। बाद में शिक्षक सत्यजीत कुमार व अन्य ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर कर हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी।

 

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