बीरेंद्र कुमार झा
सुप्रीम कोर्ट ने ‘ मीडिया ट्रायल’ पर कड़ी आपत्ति जताई है। प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि पक्षपात पूर्ण रिपोर्टिंग से लोगों को संदेह होता है कि आरोपी ने ही अपराध किया है। पीठ ने कहा कि मीडिया की खबरें पीड़िता की निजता का भी उल्लंघन कर सकती है। बुधवार को शीर्ष न्यायालय ने गृह मंत्रालय को आपराधिक मामलों में पुलिस कर्मियों की मीडिया ब्रीफिंग के बारे में विस्तृत नियमावली तैयार करने का निर्देश दिया। मंत्रालय के पास एक विस्तृत मैन्युअल तैयार करने के लिए 3 महीने का समय दिया गया है।
जनवरी में होगी अगली सुनवाई
पीठ ने संवेदनशीलता की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक राज्य के शीर्ष पुलिस अधिकारियों और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को एक महीने के भीतर गृह मंत्रालय को सुझाव सौंपने का निर्देश दिया है।पीठ ने बताया कि अब इस मामले में अगली सुनवाई जनवरी में होगी। पीठ में सभी राज्यों के पुलिस महानिदेशकों को आपराधिक मामलों में पुलिस की मीडिया ब्रीफिंग के लिए नियमावली तैयार करने के संबंध में एक महीने में गृह मंत्रालय को सुझाव देने का निर्देश दिया है।
शीर्ष न्यायालय ने कहा कि सभी राज्यों के डीजीपी दिशानिर्देशों के लिए अपने सुझाव एक महीने में गृह मंत्रालय की दें।शीर्ष न्यायालय ने इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग [NHRC] के सुझाव भी लेने की बात कही। शीर्ष अदालत उन मामलों में मीडिया ब्रीफिंग में पुलिस द्वारा अपनाए जाने वाले तौर तरीकों के संबंध में एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिनकी जांच जारी है।अदालत ने कहा कि मीडिया ट्रायल से न्याय प्रशासन प्रभावित होता है। यह तय करने की जरूरत है की जांच के किस चरण में विवरण का खुलासा किया जाना चाहिए। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा है,क्योंकि इसमें पीड़ित और आरोपी के हित शामिल हैं। इसमें बड़े पैमाने पर जनता का हित भी शामिल है।अपराध से संबंधित मामलों पर मीडिया रिपोर्ट में सार्वजनिक हित के कई पहलू शामिल होते हैं।
नहीं देनी चाहिए मीडिया ट्रायल की अनुमति
शीर्ष अदालत ने तर्क दिया कि बुनियादी स्तर पर भाषण और अभिव्यक्ति का मौलिक अधिकार सीधे तौर पर मीडिया के विचारों और समाचारों को चित्रित करने और प्रसारित करने की अधिकार के संदर्भ में शामिल है, लेकिन हमें मीडिया ट्रायल की अनुमति नहीं देनी चाहिए। लोगों को यह अधिकार है कि वह जानकारी तक पहुंचे, लेकिन अगर जांच के दौरान महत्वपूर्ण सबूत सामने आते हैं तो इससे जांच प्रभावित भी हो सकती है।
शीर्ष अदालत इसी विषय पर 2017 के निर्देश से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। अदालत ने तब सरकार से कहा था की वह आरोपी और पीड़ित के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए पुलिस ब्रीफिंग के लिए नियम बनाए और यह सुनिश्चित करे जिसमें दोनों पक्षों के अधिकारों का किसी भी तरह से पूर्वाग्रह या उल्लंघन ना हो।तब अदालत ने मसौदा रिपोर्ट पेश करने के लिए 6 सप्ताह का समय दिया था।
आरोपी निर्दोष होने का अनुमान लगाने का हकदार: सुप्रीम कोर्ट
शीर्ष अदालत ने कहा कि जिस आरोपी के आचरण की जांच चल रही है,वह निष्पक्ष और निष्पक्ष जांच का हकदार है हर स्तर पर हर आरोपी निर्दोष होने के अनुमान लगाने का हकदार है किसी आरोपी को फसाने वाली मीडिया रिपोर्ट अनुचित है। मार्च में मुख्य न्यायाधीश ने पत्रकारों से रिपोर्टिंग में सटीकता, निष्पक्षता और जिम्मेदारी के मानकों को बनाए रखने का आग्रह किया था और कहा था कि भाषणों और निर्णयों का चयनात्मक उद्धरण चिंता का विषय बन गया है। इस प्रथा में जनता के विचारों को प्रभावित करने की प्रवृत्ति है। न्यायाधीशों के निर्णय अकसर जटिल और सूक्ष्म होते हैं और चयनात्मक उद्धरण यह आभाष दे सकते हैं कि निर्णय का अर्थ न्यायाधीश के इरादे से कुछ अलग है।

