नई दिल्ली: विश्व ने प्राकृतिक आपदा का शिकार होने वाले गरीब देशों की क्षतिपूर्ति करने का फैसला किया है। वायुमंडल के बढ़ते तापमान का दुष्प्रभाव झेलने वाले देेशों के लिए इस तरह का निर्णय पहली बार लिया गया है। रविवार सुबह तक चली लंबी बैठक में औपचारिक रूप से यह फैसला हुआ। प्राकृतिक आपदा के मूल कारण वायुमंडल के बढ़ रहे तापमान को नियंत्रित करने पर कोई औपचारिक निर्णय नहीं हो सका, न ही तेल, गैस और कोयले के उपयोग को कम करने की रूपरेखा बनी।
रविवार देर रात मदद के लिए सहमत हुए विकसित देश
संयुक्त राष्ट्र द्वारा आयोजित अंतराष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन संपन्न होने के तय कार्यक्रम 18 नवंबर से एक दिन के लिए बढ़ाया गया था। 19 नवंबर को देर रात तक प्राकृतिक आपदा की चपेट में आने वाले गरीब देशों की मदद पर ज्यादातर विकसित देश सहमत हो गए थे लेकिन औपचारिक निर्णय नहीं हो सका था। पूरी रात चली बैठक के बाद रविवार तड़के गरीब देशों की मदद पर औपचारकि मुहर भी लग गई। हालांकि इस निर्णय पर अमेरिका को शुरू से आपत्ति थी।
क्षतिपूर्ति के लिए निधि बनाएंगे विकसित देश
संपन्न देश जल्द ही क्षतिपूर्ति के लिए निधि बनाएंगे। इस निधि में किस देश की कितनी हिस्सेदारी होगी, इसका निर्णय अभी नहीं हुआ है। भारत ने निर्णय का स्वागत करते हुए इसे लंबे समय से प्रतीक्षित कदम बताया है। हालांकि विकसित देशों के निर्णय से भारत, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका जैसे विकासशील देशों को मदद मिलने की संभावना बहुत कम है। गरीब देशों के प्रतिनिधि के रूप में पाकिस्तान, मालदीव, और कुछ अन्य देशों ने निर्णय का स्वागत किया है।
भारत की मांग से सहमत हुए यूरोपीय देश
पर्यावरण सम्मेलन में भारत ने तेल, गैस और कोयले के उपयोग चरणबद्ध ढंग से कम करने का सुझाव दिया था। यूरोपीय संघ के देश भी भारत की मांग से सहमत थे। उनका मानना है कि वायुमंडल का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस रखने के लिए इन प्राकृतिक ईंधनों का उपयोग कम किया जाना चाहिए, लेकिन विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों के बीच इस मुद्दे पर सहमति नहीं बन पायी।

