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सुप्रीम कोर्ट ने बिलकिस बानो बलात्कार मामले में सुनवाई करते हुए गुजरात सरकार से कई सवाल पूछे हैं। कुछ सवाल तो काफी कड़े पूछे गए। जस्टिस बीवी नागरत्ना और उज्ज्वला भुंइया की पीठ ने गुजरात सरकार से पूछा कि दोषियों को मौत की सजा हुई थी, जिसे बाद में उम्रकैद में बदला गया, ऐसे में वे महज 14 साल की सजा काटकर ही कैसे रिहा हो गए? फिर 14 साल की सजा के बाद रिहाई की राहत बाकी कैदियों को क्यों नहीं दी जा रही? इस मामले में कुछ चयनित लोगों को हीं छूट क्यों दी जा रही है? सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार से कहा कि दोषियों को सजा में छूट देने में राज्य सरकारों को चयनात्मक नहीं होना चाहिए और हर कैदी को सुधार व समाज से जुड़ने का मौका मिलना चाहिए।
सर्वोच्च अदालत की तरफ से यह टिप्पणी गुजरात सरकार की ओर से पेश सालिसिटर जनरल राजू की उस दलील के जवाब में आई जिसमें राजू ने कहा था, ‘कानून कहता है कि दुर्दांत अपराधियों को खुद में सुधार करने का मौका दिया जाना चाहिए।’
सालिसिटर जनरल एसवी राजू ने बिलकिस बनो केस में दोषियों की रिहाई पर अदालत में हो रही सुनाई कर दौरान अदालत के समक्ष कहा ‘इन 11 दोषियों द्वारा किया गया अपराध जघन्य था, लेकिन वह दुर्लभतम मामलों की श्रेणी में नहीं आता। इसलिए वे सुधार का मौका पाने के हकदार हैं। व्यक्ति ने अपराध किया होगा… किसी खास क्षण में कुछ गलत हो गया होगा। बाद में उसे हमेशा परिणामों का अहसास हो सकता है।’
गुजरात सरकार की तरफ पेश रवि ने आगे कहा ‘ इन सभी 11 दोषियों ने जो किया उसके लिए पहले इन्हें मौत की सजा मिली, बाद में इसे उम्रकैद में बदला गया, फिर 14 साल तक इन्होने जेल की सजा काटी। लेकिन इस दौरान वो अपराधबोध से भरे रहे। उन सभी को अपनी गलतियों का एहसास है।’ इन दलीलों पर जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जवल भुइयां की पीठ ने पूछा कि इस कानून को जेल में अन्य कैदियों पर भी लागू किया जा रहा है या सिर्फ कुछ चुनिंदा कैदियों को ये सुविधा मिल रही है?

