आखिर देश के इन  राजनीतिक दलों  से इंडिया  और एनडीए वाले दूरियां बनाकर क्यों  चल रहे हैं ?

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अखिलेश अखिल 
मंगलवार को एनडीए वालों में 39 और इंडिया वालों ने 26 दलों के साथ बैठक की ।दिल्ली से लेकर बेंगलुरु तक सियासी तापमान बढ़ा रहा । लेकिन सवाल है कि इन दोनो गुटों ने आखिर इन दस दलों को अपने साथ क्यों नहीं लाया जिससे सरकार भी चल रही है और जिनके संसद में सदस्य भी है और जिनकी राजनीतिक जमीन भी है ।राजनीतिक गलियारों में इस पर अब चर्चा चल रही है । हालांकि यह बात और है कि बीजद नेता और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और आंध्र प्रदेश के सीएम जगन रेड्डी ने अकेले चुनाव लड़ने का सीलन काफी पहले ही कर चुके है लेकिन इसके बाद के दलों से कोई संबंध क्यों नही बनाया ।
बता दें कि अभी एनडीए का को गठबंधन बना है उसमे 16 से ज्यादा ऐसी पार्टी शामिल है जिनका संसद में कोई सदस्य नही है ।इंडिया वाले समूह में भी दस ऐसे दल है जिनके संसद में कोई सदस्य नही है ।जबकि जेडीएस ,ओवैसी की पार्टी और असम में राजनीति कर रही ए आई यू डी एफ जैसी पार्टी भी जिसके जमीनी आधार भी हैं और लोकसभा से लेकर विधान सभा में अच्छी सीट भी है ।यही हाल केसीआर को पार्टी बीआरएस की भी है लेकिन इन्हें किसी भी गुट ने अपने में शामिल नहीं किया । खबर है कि जेडीएस इंडिया वाले गुट में शामिल होने को तैयार थी लेकिन कांग्रेस ने माना कर दिया ।  तो सवाल है कि क्या इन पार्टियों को दोनो गठबंधन अछूत मान रही है ?     
 एक समय था जब हरियाणा  से लेकर देश की राजनीति में चौटाला परिवार को तूती  बोलती थी ।लेकिन आज इस परिवार की इनेलो यानी  इंडियन नेशनल लोकदल कही नही है ।अपनी जमीन तलाश रही है यह पार्टी । सबसे पहले इनेलो  के मंच से ही नीतीश कुमार ने विपक्षी एकता की मुहिम शुरू की थी । 25 सितंबर 2022 को देवीलाल के जयंती पर हरियाणा में कई दलों का महाजुटान हुआ था । हालांकि, इनेलो को बाद में न तो विपक्षी मोर्चे से और न ही एनडीए से कोई न्योता आया है । 
    बता दें कि इनेलो की स्थापना चौधरी ओम प्रकाश चौटाला ने 1996 में किया था । हरियाणा के जाट वोटरों पर इस पार्टी की मजबूत पकड़ रही है ।2014 के चुनाव में इनेलो को 2 सीटों पर जीत मिली थी ।2019 तक हरियाणा विधानसभा में इनेलो दूसरे नंबर की पार्टी रही है ।इतना ही नहीं, चौटाला का राजनीतिक संबंध नीतीश कुमार से भी बेहतर रहा है । इसके बावजूद चौटाला को विपक्षी एका में जगह नहीं मिली है ।   
 इनेलो से टूटी दुष्यंत चौटाला की पार्टी जेजेपी का बीजेपी से गठबंधन है, इसलिए इनेलो के लिए एनडीए में ज्यादा जगह नहीं है । विपक्षी एकता में इनेलो को शामिल करने को लेकर कांग्रेस ने वीटो लगा दिया । कांग्रेस का तर्क है कि 2014 को छोड़ दिया जाए, तो 2004 के बाद से ही इनेलो लोकसभा में सीटें जीतने में असफल रही है । चौटाला परिवार के कई लोग भ्रष्टाचार के मामले में सजायाफ्ता भी रह चुके हैं । यह भी इनेलो के लिए रोड़ा बन गया ।   
  तो फिर जेडीएस को गठबंधन में क्यों नही शामिल किया गया ? कहते हैं कि बेंगलुरु में विपक्षी पार्टी की बैठक से पहले जनता दल सेक्युलर के कार्यकारी अध्यक्ष एचडी कुमारस्वामी का एक बयान खूब सुर्खियां बटोरी । उन्होंने कहा कि हमें न तो विपक्ष ने पूछा है और न ही एनडीए से कोई न्योता आया है । 
   जेडीएस एक क्षेत्रीय पार्टी है, जिसका जनाधार केरल और कर्नाटक में है ।इस पार्टी की स्थापना पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा ने साल 1999 में की थी । वर्तमान में इस पार्टी के पास लोकसभा में एक सीट है । देवगौड़ा कर्नाटक की राजनीति में कई बार किंगमेकर की भूमिका निभा चुके हैं ।
    1996 में जनता पार्टी की सरकार में उन्हें प्रधानमंत्री बनाया गया था । कांग्रेस कोटे से 2019 में देवगौड़ा राज्यसभा गए थे । ओल्ड मैसूर और हैदराबाद कर्नाटक में देवेगौड़ा की मजबूत पकड़ है ।2009 के चुनाव में जेडीएस ने लोकसभा की 3 सीटों पर जीत दर्ज की थी ।2014 में भी जेडीएस कर्नाटक की 2 सीटें बचाने में कामयाब रही थी । हाल के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जेडीएस को 13.29% वोट मिले हैं । पार्टी विधानसभा की 19 सीट जीतने में भी कामयाब रही है । लेकिन यह सब होते हुए भी इस जेडीएस को किसी गठबंधन में शामिल नहीं किया गया ।   
 एक महीना पहले कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने कहा था कि जेडीएस के साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे । हालांकि, दिल्ली में एनडीए मीटिंग में जीडीएस को नहीं बुलाया गया । इसके पीछे गठबंधन में बात फाइनल नहीं होने को वजह माना जा रहा है ।बीजेपी इसलिए अब तक अपना नेता प्रतिपक्ष भी नहीं चुन पाई है । चर्चा के मुताबिक बीजेपी कर्नाटक में भी झारखंड फॉर्मूला लागू करना चाहती है । झारखंड में जेवीएम का विलय करके उसके अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी को बीजेपी विधायक दल का नेता घोषित कर दिया था ।बीजेपी कर्नाटक में भी यही चाह रही है । पार्टी का मानना है कि अलग-अलग लड़ने से वोट ट्रांसफर में दिक्कत आएगी और जेडीएस को ज्यादा सीटें देनी पड़ेगी ।बीजेपी-जेडीएस में गठबंधन को लेकर बातचीत होने की वजह से भी कांग्रेस ने भी कुमारस्वामी को न्योता नहीं दिया ।   
  इसी तरह ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट को भू किसी गठबंधन में शामिल नहीं किया गया । इस पार्टी का असम में मजबूत जनाधार है ।2019 में पार्टी ने लोकसभा के एक सीट पर जीत भी हासिल की थी । मौलान बदरुद्दीन अजमल ने 2005 में इसकी स्थापना की थी । 2014 के चुनाव में इस पार्टी को लोकसभा की 3 सीटों पर जीत मिली थी । यह पार्टी  असम के मुसलमानों के हक और हुकूक की बात करने के लिए जानी जाती है ।असम में 40 प्रतिशत से अधिक मुसलमान हैं । असम विधानसभा में इस पार्टी  के पास 16 विधायक हैं । पार्टी का 3 सीटों पर दबदबा है । 
  असम में गठबंधन की शक्ति कांग्रेस ने अपने पास रखी है । 2021 में कांग्रेस ने असम में महाजोट (महागठबंधन) बनाया था, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली । कांग्रेस 95 में से सिर्फ 29 सीटों पर जीत दर्ज कर पाई. वहीं 20 सीट पर लड़कर यह पार्टी  16 जीत गई ।
    2019 में यह पार्टी  अकेले दम पर 3 सीटों पर चुनाव लड़ी थी । धुबरी में अजमल ने कांग्रेस के अबु ताहेर को हराया था । कांग्रेस यहां अपने शर्तों पर गठबंधन करना चाह रही है. इसकी वजह सीट का बंटवारा है । कांग्रेस की कोशिश है कि अधिक से अधिक मुस्लिम सीटों पर खुद चुनाव लड़े ।पहले की तरह ही अजमल का दावा 3 सीट पर है । अगर कांग्रेस गठबंधन करती है, तो उसे 1 सीटिंग सीट (बरपेटा) गंवानी पड़ सकती है । कांग्रेस ने इसलिए अभी गठबंधन में अजमल की पार्टी को एंट्री नहीं दी है ।   
इसी तरह ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन यानी ए आई ईएमआई एम  का मतलब होता है- मुसलमानों की एकता परिषद । 1927 में इसकी स्थापना हुई थी और वर्तमान में इस पार्टी के पास देशभर में 1 करोड़ से अधिक सदस्य हैं ।2008 से असदुद्दीन ओवैसी इसके अध्यक्ष हैं ।यह पार्टी संवैधानिक दायरे में रहकर मुसलमानों के वेलफेयर और अधिकार की बात करती है । इस पार्टी का आंध्र (अब तेलंगाना) की सियासत में काफी प्रभावी रहा है । ओवैसी के अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी का महाराष्ट्र और बिहार में भी विस्तार हुआ । 2019 में इस पार्टी को 2 लोकसभा सीटों पर जीत मिली ।बिहार के किशनगंज में इस पार्टी के उम्मीदवार तीसरे नंबर पर थे ।वर्तमान में बिहार, तेलंगाना और महाराष्ट्र विधानसभा में भी इस पार्टी के पास विधायक हैं । असदुद्दीन ओवैसी यूपी और पश्चिम बंगाल में जनाधार बढ़ाने की जुगत में भी है । इन दोनों राज्यों में मुस्लिम आबादी काफी अधिक है ।   
ओवैसी मुसलमानों के बीच काफी लोकप्रिय हैं और उनके भाषण खूब वायरल भी होते हैं । देश में से लोकसभा की 80 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम आबादी 20 फीसदी से अधिक है । बंगाल, असम और बंगाल की करीब 20 सीटों पर 50 प्रतिशत से अधिक मुसलमान हैं ।
     बीजेपी से दूरी बनाकर चल रही एआईएमआईएम को विपक्षी मोर्चे से उम्मीद थी, लेकिन क्षेत्रीय पार्टियों की वजह से यह संभव नहीं हो पाया । जानकारों का मानना है कि मुस्लिम मुद्दे को लेकर मुखर रहने वाली ओवैसी की पार्टी अगर विपक्ष के साथ आती तो बीजेपी 80 बनाम 20 की लड़ाई बनाने की कोशिश करती ।

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