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अधिनायकवाद और तानाशाही का अंत निश्चित!

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प्रकाश पोहरे, प्रधान संपादक, दैनिक ‘देशोन्नती’, हिंदी दैनिक ‘राष्ट्र प्रकाश’, साप्ताहिक ‘कृष्णकोणती’

‘अहंकार में तीनों गए धन, वैभव और वंश,
न मानो तो देख लो, रावण, कौरव और कंस।’
रावण, कौरव और कंस सभी धनवान और विद्वान थे, लेकिन उन्होंने जीवन भर अत्याचार, छल और झूठ से शासन किया। यह सब उन्होंने अहंकार से किया। परिणामस्वरूप, उनका पूरा वंश समाप्त हो गया।

इसका एक अच्छा उदाहरण हिटलर और मुसोलिनी के साम्राज्यों में भी देखा जा सकता है। हिटलर के नाज़ी साम्राज्य की स्थापना छद्म विज्ञान, जातिवाद और सैन्य अहंकार पर की गई थी। मुसोलिनी ने इथोपिया जैसे देशों पर अधिकार कर आक्रामक तरीके से इटली के साम्राज्य का विस्तार किया। मुसोलिनी ने इस युद्ध में हुए अपार नुकसान की तुलना राष्ट्रवाद, पुरुषत्व आदि से की। इटली के लोग सचमुच मुसोलिनी के दीवाने थे। उनके भाषणों को सुनने के लिए लोगों की भारी भीड़ जुटती थी। मुसोलिनी भी रंग में आकर, हाथ ऊपर-नीचे करके और हाव-भाव बनाकर लोगों से सीधा संवाद करता था। यह उन्माद अंततः मुसोलिनी के ग्राफ के एक गहरे ब्लैक होल में गिरने के रूप में समाप्त हुआ। अपने जीवन के अंत में, मुसोलिनी नाज़ी सैनिकों की मदद से जब एक ट्रक में छिप कर भाग रहा था, तब उसे इटालियंस ने गोली मार दी थी। मुसोलिनी के दुखद अंत के बाद हिटलर ने भी आत्महत्या कर ली थी। यह इतिहास सिद्ध करता है कि विश्व का सामान्य मानव इस तरह के अधिनायकवाद को अधिक समय तक सहन नहीं कर सकता। अधिनायकवाद का अंत निश्चित है।

एडॉल्फ हिटलर ने 1933 में जर्मन संसद में लगी आग का फायदा उठाकर खुद को हमेशा के लिए चांसलर घोषित कर दिया। पूरी संभावना है कि उसने ही आग लगाई होगी। क्या हमारे देश के शासक यही हासिल करना चाहते हैं? वर्तमान में भारतीय राजनीतिक तस्वीर में विविधता लाने वाले कई विपक्षी दलों के साथ डिजिटल मीडिया का प्रबंधन और प्रिंट मीडिया को हाशिए पर, कलंकित या नष्ट करके भारत को एक-दलीय राज्य बनाने के उद्देश्य से शक्ति का दुरुपयोग किया जा रहा है।

मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में अपने पहले दिन ही यह स्पष्ट कर दिया कि वह भारत को एकदलीय राष्ट्र बनाकर जीवन भर देश का नेतृत्व करना चाहते हैं। 2014 में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद अपने भाषण में उन्होंने अगले दस वर्षों की योजनाओं के बारे में विस्तार से बताया। यह स्पष्ट है कि मोदी लोकतंत्र में सरकार को मिलने वाले कार्यकाल से परे देख रहे थे और देख रहे हैं। तब से उनका हर कार्य भारत के इतिहास पर अपनी छाप छोड़ने के उद्देश्य से किया गया है, जो कभी नहीं मिटेगा, चाहे उसकी कीमत कितनी भी हो! नई दिल्ली में अनावश्यक रूप से एक नया संसद भवन ‘सेंट्रल विस्टा’ बनाने की परियोजना काफी प्रभावशाली है। कम से कम 2034 तक रहने के इरादे से प्रधानमंत्री के लिए एक नया महल भी बनाया जा रहा है।

दूसरी तरफ मोदी सरकार देशभक्त होने का ढोंग कर अपनी नाकामी पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है। सरकार कृषि की खराब स्थिति, बेरोजगारी, सामाजिक अशांति, आर्थिक गिरावट जैसे कई मोर्चों पर विफल रही है। आठ साल से देशभक्ति के ढोल लगातार बज रहे हैं कि भारत का बहुनस्लीय, बहुधार्मिक लोकतंत्र खतरे में नहीं है। 2019 में एक बार फिर से मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार के सत्ता में आने के बाद, तस्वीर यह है कि लोकतंत्र ध्वस्त हो गया है, क्योंकि उनके शासन के दौरान न तो विपक्ष की राय का सम्मान किया गया और न ही जनता का!

हाल ही में संसद में एक ताजा मामला गुंजायमान रहा। हिंडनबर्ग रिसर्च ने 24 जनवरी, 2023 को अदानी समूह पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की। रिपोर्ट से पता चलता है कि कैसे गौतम अडानी द्वारा बनाई गई कंपनियों ने “शेयर मार्केट” का मोर्चा संभाला और बड़ी मात्रा में व्यापार करके अदानी समूह की कंपनियों के शेयर की कीमतों को कृत्रिम रूप से बढ़ा दिया। अडानी समूह और उसके रिश्तेदार कैसे ‘शेल कंपनियां’ चलाते हैं और कैसे इन विदेशी शेल कंपनियों के पैसे का इस्तेमाल ‘खातों में हेरफेर’ के लिए किया जाता है, इसका खुलासा भी उस रिपोर्ट में किया गया है। यानी जब हमारी किसी कंपनी को घाटा हो रहा हो या उसका ‘कैश-फ्लो’ खराब हो और उसे कर्ज की जरूरत हो, तो इन विदेशी शेल कंपनियों से घाटे में चल रही कंपनी में पैसा डाला जाता है। इनमें लाभ तब दिखाया जाता है, जब कोई वास्तविक लाभ ही नहीं होता है। एक बार ऋण प्राप्त हो जाने के बाद, उसी पैसे को दूसरी घाटे वाली कंपनी को यह दिखाने के लिए भेज दिया जाता है कि यह ‘लाभप्रद’ है। इस प्रकार, इस ‘हिंडनबर्ग रिसर्च’ ने दिखाया है कि कैसे इन शेल कंपनियों के पैसे का उपयोग यह दिखाने के लिए किया जाता है कि अडानी समूह की विभिन्न कंपनियां लाभ में चल रही हैं!

बेशक, यह बेहद जटिल मामला है। वास्तव में, यह महसूस करने का कोई कारण नहीं है कि किसी भी भारतीय उद्योगपति को इस तरह परेशानी में पड़ना चाहिए। ‘हिंडनबर्ग रिसर्च’ पर पूरा विश्वास करके अपने देश के उद्योगपतियों पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं है, लेकिन यहां सवाल निवेशकों के पैसे का है। इसी तरह जिन भारतीय बैंकों ने अडानी समूह को अरबों का कर्ज दिया, एलआईसी जैसी कंपनियां जिन्होंने अडानी की कंपनी में 80 हजार करोड़ रुपये का निवेश किया, वह लोगों के पैसे का सवाल है। उस समय जनता को केंद्र मानते हुए सरकार के लिए इस मामले को गंभीरता से देखना जरूरी था। हिंडनबर्ग रिपोर्ट को लेकर संसद में कई दिनों तक भारी हंगामा हुआ। कांग्रेस, आप, तृणमूल समेत 13 विपक्षी दलों ने इसे घोटाला बताते हुए `संयुक्त संसदीय समिति’ (जेपीसी) के माध्यम से जांच की मांग की, लेकिन सरकार ने इसे नजरअंदाज कर दिया। शुक्रवार को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई बहस में विपक्ष ने हिस्सा लिया और अडानी मामले को विस्तार से उठाया। उसमें राहुल गांधी ने विस्तार से पेश किया कि कैसे मोदी सरकार अडानी पर ‘दयालु’ है, और कैसे मोदी… अडानी के विमान में यात्रा करते हैं, या अडानी कैसे मोदीजी के विमान में आगे-पीछे घूमते हैं। हालांकि विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पूरे भाषण में एक बार भी अडानी का जिक्र नहीं किया। इसके विपरीत प्रधानमंत्री ने कांग्रेस काल के ‘टू जी’, ‘थ्री जी’, कोयला आदि घोटालों का जिक्र किया। लोकसभा में बोलते हुए भी उन्होंने अपनी पीठ थपथपाई। मुद्दे उठाए गए कि नेहरू के नाम का इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया? कुल मिलाकर मोदी हमेशा की तरह जिस भाषा का इस्तेमाल करते हैं, विपक्षी दलों के मुद्दों को चतुराई से टालते हुए और विपक्ष और पूर्व के शासकों पर कटाक्ष करते हैं। अगर कोई उनका भाषण सुनेगा तो समझ में आएगा कि ऐसी भाषा प्रधानमंत्री पद को शोभा देने वाली नहीं है।

मोदी सरकार के आठ साल हो गए हैं। क्या किसी ने सोचा कि मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं करते? जवाब साफ है- पत्रकारों के सवालों का जवाब देने की उनमें हिम्मत नहीं है। संसद में भी वे विपक्षी दलों के सवालों का जवाब नहीं देना चाहते। वे सिर्फ अपने पूंजीवादी फैसलों को जनता पर थोपना चाहते हैं। जो शासक अपने फैसलों के लिए संवैधानिक संस्थाओं या देश के नागरिकों को जवाब नहीं देना चाहते, ऐसे शासक लोकतंत्र के मूल्यों का हनन कर रहे हैं। मोदी सरकार उसी रास्ते पर चल रही है। लोकतंत्र में नागरिकों और संविधान को जवाबदेह होना पड़ता है। हालांकि, पिछले आठ वर्षों में मोदी सरकार ने लोकतंत्र के सभी संकेतों को नष्ट कर दिया है और तानाशाही की ओर बढ़ना शुरू कर दिया है।

मुद्दा यह है कि भारत की संविधान निर्माण प्रक्रिया के दौरान संसदीय लोकतंत्र या अमेरिकी तर्ज पर राष्ट्रपति (अध्यक्षीय प्रणाली) लोकतंत्र का सवाल उठाया गया था। तब देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने इस संदर्भ में ‘संसदीय लोकतंत्र’ पर मुहर लगाई। नेहरू ने संसदीय लोकतंत्र पर अपने विचार रखे हैं। नेहरू ने इस बात पर जोर दिया कि भारत की विभाजनकारिता और विविधता को देखते हुए इसकी तर्कसंगतता, शांतिपूर्ण तरीके, सरकार के अन्य रूपों से दबाव की कमी, आत्म-अनुशासन, व्यक्तिगत विकास के अवसर और ऐसी अन्य विशेषताओं के कारण ‘संसदीय लोकतंत्र’ ही एकमात्र समाधान है। चूंकि लोकतंत्र में चर्चा, संवाद और परामर्श के माध्यम से निर्णय लिए जाते हैं, इसलिए उन निर्णयों का स्थायित्व अधिक होता है। नेहरू का मत था कि इससे लोगों का विश्वास बढ़ता है और वे राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में भाग ले सकते हैं। इसके अलावा, उनका मानना ​​था कि अगर भारत को एक उपमहाद्वीप राष्ट्र के रूप में एकजुट होना है, तो संसदीय लोकतंत्र के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

यह नेहरू का दृढ़ विश्वास था कि जहां ‘राष्ट्र’ पहले आया, अधिनायकवादी शासन का कोई रूप स्थापित किया जा सकता है और राष्ट्र के पक्ष में लोगों के अधिकारों को कम किया जा सकता है। क्योंकि, संविधान निर्माताओं को पता था कि लोकतंत्र पर बाहर से हमला नहीं होता, बल्कि लोकतंत्र के गढ़ को भीतर से कमजोर किया जाता है। हमारे वर्तमान लोकतंत्र की प्रगति को देखते हुए यह सटीक रूप से लागू होता है। अतीत में, लोकतंत्र के विकास के लिए आवश्यक आंतरिक शक्तियों को संरक्षित किया गया था। वैकल्पिक रूप से, संसदीय निर्देशों का पालन, संविधान में नैतिक मूल्यों का संरक्षण, विरोधियों का सम्मान, वोट की स्वतंत्रता पर जोर, संसदीय रीति-रिवाजों का सम्मान और संसदीय मूल्यों पर विचार करके कुछ राजनीतिक आदर्शों को मन में बैठाने का ईमानदार प्रयास किया गया। परंपराएं आदि वर्तमान समय में ये सभी पहलू लुप्त हो गए हैं और देश में हिटलरशाही जैसा आभास होने लगा है।

अब समय आ गया है कि इस बात का परीक्षण किया जाए कि गांधी-नेहरू परिवार, जिसके बारे में मोदी शेखी बघारते हैं, ने वास्तव में देश को क्या दिया? आठ साल में मोदी के मुंह से सिर्फ शब्द और आंकड़े ही सुने गए। सहकार, परमाणु विज्ञान, प्रौद्योगिकी, कंप्यूटर, संचार क्रांति जैसे विभिन्न क्षेत्रों में देश को पिछले 70 वर्षों में जो दूरगामी नीतियां मिलीं, मोदी के शासन में किसी भी क्षेत्र में एक भी उपलब्धि नहीं देखी गई। पुरानी योजनाओं या कार्यक्रमों का नाम बदलने अथवा चमकदार विज्ञापनों के अलावा कुछ भी मूल नहीं था। इसलिए देश की जनता उम्मीद करती है कि मोदी इन 70 सालों को ‘अंधेरे युग’ के रूप में न देखें, बल्कि प्रेरणा के रूप में देखें। पूर्वाग्रह और अहंकार को छोड़कर विनम्रता से कुछ करें। अन्यथा अधिनायकवाद का अंत निश्चित है!

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